महमूदाबाद हाऊस में ‘पाण्डुलिपियों की संरक्षा और सुरक्षा’ पर कार्यशाला आयोजित

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5 – 6 जनवरी तक चलेगा आयोजन

लखनऊ, 05 जनवरी। महमूदाबाद हाऊस में आज पाण्डुलिपियों की संरक्षा और सुरक्षा विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन हुआ। अशोका विश्वविद्यालय के अली खान महमूदाबाद और मैरीलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैथ्यू मिलर की ओर से आयोजित इस कार्यशाला में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ सम्मिलित हुए। इन विशेषज्ञों में फ्रांस के राष्ट्रीय संग्रहालय के पूर्व निदेशक प्रोफेसर फ्रांसिस रिचर्ड का नाम भी है। प्रोफेसर रिचर्ड इस्लामिक कला के साथ फारसी भाषा की पाण्डुलिपियों के विशेषज्ञ है। कार्यशाला में अमरीका स्थित हिल संग्रहालय व लाइब्रेरी के निदेशक प्रोफेसर कोलम्बा स्टीवर्ट और फारसी की पाण्डुलिपियों में संगमरमर की तकनीक के विशेषज्ञ डाॅ. जेक बेन्सन ने भी उक्त विषय पर अपने विचाार रखे।

कार्याशाला पाण्डुलिपियो की देखभाल, संरक्षण और सुरक्षा की उच्चतम और अत्याधुनिक तकनीक की जानकारी व जागरूकता पर केन्द्रित रही। भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों और लाइब्रेरियों से सम्बन्धित उपस्थित जनों ने उपरोक्त विशेषज्ञों से काफी कुछ सीखा।

कार्यशाला में डाॅ. बेन्सन ने पाण्डुलिपियों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए उचित पर्यावरण और उनकी देखभाल की आवश्यकता पर अपने कीमती विचार रखे।

प्रोफेसर फ्रांसिस रिचर्ड ने बताया पाण्डुलिपियाँ न केवल लिखित रूप में बल्कि वस्तु के रूप में भी हमें स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय इतिहास की जानकारी देती है। उन्होनें यह भी बताया कि पाण्डुलिपियों पर लगी मुहर न केवल यह बताती है कि उक्त पाण्डुलिपि का सम्बन्ध किससे है। बल्कि पाण्डुलिपियों ने अक्सर दूर की यात्रा कैसी की उसकी तारीख का भी वर्णन कर सकती हैं।

प्रोफेसर स्टीवर्ट ने दूसरी ओर पाण्डुलिपियों में वर्णित नायाब इतिहास और ज्ञान की सुरक्षा के लिए संगठनों के एक साथ आने की फौरी आवश्यकता पर जोर दिया।

प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद ने पाण्डुलिपियों के अपने पारिवारिक संग्रह और ब्रिटिश लाइबे्ररी की मदद से उनके संरक्षण के सम्बन्ध में बताया। उन्होंने बताया कि यह समझने की आवश्यकता है कि पाण्डुलिपियों के डिजिटलीकरण और इन्टरनेट के माध्यम से उन तक पहुंचाने से उनकी कीमत नहीं घट जाती है। जैसा कि प्रसिद्ध है। उन्होंने यकीन दिलाया है कि महमूदाबाद की पाण्डुलिपियों का संग्रह जल्द ही आनलाइन उपलब्ध होगा। डिजीटलीकरण का एक लाभ यह भी है कि इसके बाद ज्यादा से ज्यादा शोध के छात्र पाण्डुलिपियों तक पहुंच सकते हैं और तारीख का अपना ज्ञान वर्धन कर सकते हैं।

कार्याशाला के अवसर पर काफी संख्या में पाण्डुलिपियाँ प्रदर्शित की गई। इनमें एक विशेष मुगलकालीन पाण्डुलिपि भी प्रदर्शित की गई जिसमें मुगल बादशाह शाहजहाँ उसकी पत्नी और बच्चों से सम्बन्धित जानकारी के साथ-साथ सिकन्दरा की इमारत के निर्माण में कौन-कौन से और कितने वजन और किस कीमत के पत्थर प्रयोग किये गये इन सबका वर्णन है। दिल्ली स्थित नूर माईक्रोफिल्म केन्द्र की ओर से कटी-फटी पाण्डुलिपियों को संरक्षित करने की अत्याधुनिक तकनीक प्रदर्शित की गई। उपरोक्त कार्यशाला के आयोजन में हरयाणा स्थित अशोक विश्वविद्यालय, ब्रिटिश लाइबे्ररी, हिल संग्रहालय व लाइबे्ररी, रोशन इंस्टीट्यूट आॅफ परशियन इंस्टीट्यूट, नूर माईक्रोफिल्म केन्द्र, राजा महमूदाबाद संग्रहालय व लाइबे्ररी इत्यादि ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया।

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