पटना, 08 अक्टूबर 2018: चर्चित बुद्धिजीवी अनिल चमड़िया ने कहा कि पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण को जायज ठहराते हुए इसे खत्म नहीं किए जाने की वकालत की थी। उन्होंने कहा कि भागवत ने अपने वक्तब्य में यह भी कहा कि आरक्षण को खत्म करने की बात इसका लाभ लेने वाला तबका ही करेगा। भागवत के इस बयान के निहितार्थ को समझने की जरूरत है। जबकि सच्चाई यह है कि आरक्षण दलितों-वंचितों के हाथ से तेजी से बाहर जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि कुछ सरकारी संस्थानों का ही इस दृष्टि से अध्ययन कर लिया जाए तो इसकी पूरी तस्वीर सामने आ जाएगी कि उन संस्थानों में बहुजनों का कितना प्रतिनिधित्व है।
उन्होंने कहा कि आरएसएस का उद्देश्य राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण करना रहा है। आरएसएस ने राजनीति के हिंदूकरण में लगभग सफलता प्राप्त कर ली है। फिलहाल देश में कोई ऐसी पार्टी नहीं बची है, जो राममंदिर बनने का विरोध कर सकता है। महज दिखावे का विरोध नहीं, प्रभावकारी विरोध कर सकने की स्थिति में आज कोई राजनीतिक दल नहीं है। आगे उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने राजनीति के दलितीकरण पर जोर दिया था। वे तमाम शूद्र जातियों और दलितों को राजनीति के केंद्र में लाने के लिए प्रयत्नशील रहे. यह देश बहुजनों का है, किन्तु पूरी शासन व्यवस्था पर कुछ लोगों का वर्चस्व कायम है।
बता दें कि नये दौर में नये सिरे से सामाजिक न्याय आंदोलन को आगे बढ़ाने हेतु 7 अक्टूबर को बिहार की राजधानी पटना में राज्य के दर्जनों जिले के सामाजिक न्याय के लिए संघर्षशील संगठनों के प्रतिनिधियों व बुद्धिजीवियों का राज्यस्तरीय सम्मेलन हुआ। सामाजिक न्याय के नाम पर चल रही समर्पणकारी राजनीति से इतर पहलकदमी की जरूरत महसूस करने वाले कार्यकर्ताओं- बुद्धिजीवियों व छात्र-नौजवानों के सम्मेलन चर्चित वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया मुख्य वक्ता के बतौर मौजूद थे।
अनिल चमड़िया ने कहा कि आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, वह पुनर्गठन का दौर है। बहुजन विरोधी शक्तियां लगातार अपने आपको पुनर्गठित कर रही हैं. किंतु बहुजनों की बात करने वाली शक्तियां पुनर्गठन को लेकर सजग नहीं हैं। यही कारण है कि बहुजन तबके से जाने वाला प्रतिनिधि उसी सिस्टम का अंग बन जाता है। पिछले दो-तीन दशकों से सामाजिक न्याय की पूरी धारा केवल आरक्षण पर जुबानी जमा खर्ची तक सीमित हो गई है। बहुजनों के नाम पर राजनीति करने वालों ने सामाजिक न्याय का कोई ढांचा बनाने पर जोर नहीं दिया। आज सामाजिक न्याय व सामाजिक बदलाव के नेताओं को आरएसएस के साथ-साथ बहुजन धारा भी देवता बनाने के षड्यंत्र में लगी है।






