पुण्यतिथि व जयंती पर भी नहीं याद किये गए फिरोज गाँधी, जनेऊ दिखाने वाले राहुल गांधी पितृ पक्ष में अपने दादा को आज तक नहीं चढ़ाए एक लोटा जल
उपेन्द्र नाथ राय
लखनऊ, 26 सितम्बर 2019: जब चुनाव आता है तो कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने जनेऊ पहन लिया। शिव का दर्शन करने पहुंच गये। प्रियंका गांधी प्रयागराज में हनुमान मंदिर का दर्शन कर गंगा के रास्ते वाराणसी तक यात्रा की। यह यात्रा हिंदुओं के प्रति आस्था दिखाने की एक कोशिश रही लेकिन पितृ पक्ष का हिन्दु धर्म में महत्व के साथ ही पूरा कांग्रेस वहीं प्रयागराज में बने राहुल गांधी के दादा की कब्र पर एक फुल चढ़ाना भी भूल गया।
बता दें कि 12 सितम्बर को उनकी जयंती थी और आठ सितम्बर को उनकी पुण्यतिथि लेकिन दोनों तिथियों पर उनकी कब्र एक फूल को तरस गयी। अपनों की नजर की तो बात ही दूर है। अपने दल की जिला इकाई भी वहां जाकर दो फूल चढ़ाना उपयुक्त नहीं समझी। यहां तक कि अपने को हिन्दुवादी सिद्ध करने की कोशिश करने वाले भाई-बहन के दादा की कब्र पितृपक्ष में अपनों के द्वारा चढ़ाए जाने वाले एक लोटा जल के लिए भी तरस गया।
प्रियंका गांधी के राजनीति में पदार्पण को लेकर कांग्रेसियों ने जबरदस्त प्रचार किया। उनमें इंदिरा गांधी की झलक देखी जा रही थी। अपने भाई राहुल को जीत दिलाने के लिए प्रियंका गांधी ने प्रयागराज से अपने चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत की थी। सबको याद है कि प्रयागराज में प्रियंका ने ‘लेटे हनुमान’ जी के मंदिर में दर्शन -पूजन और आरती की। संगम गयीं और वहां से जलमार्ग से वाराणसी के लिए रवाना हुईं। उन्होंने हिन्दूओं से अपनापा प्रदर्शित करने की भरपूर कोशिश की। कुछ कांग्रेसियों को लगता है कि इंदिरा गांधी के नाक – नक्श सी दिखने वाली प्रियंका गांधी देश की बड़ी नेता बन सकती हैं। प्रियंका गांधी भी अपनी दादी की छवि को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन अपनी दादी के नक्श कदम पर चलने की कोशिश करने वाली प्रियंका उस समय भी उसी प्रयागराज में बने अपने दादा की कब्र का दर्शन करना भी भूल गयी थीं। यह कहा जा सकता है कि उस समय भागम-भाग की स्थिति थी लेकिन क्या किसी भी धर्म में ऐसा देखने को मिला है कि जयंती या पुण्यतिथि पर भारत में किसी के परिवार को कोई सदस्य कब्र पर एक फूल चढ़ाने भी न पहुंचे।
इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र सिंह का कहना है कि परिवार के किसी न किसी सदस्य को यहां आना चाहिए। यदि नहीं आते हैं तो इससे गलत संदेश जाता है। आखिर यदि बड़े लोग अपने पुरखों को भूला देंगे तो सामान्य लोगों में तो इससे गलत संदेश जाता है। समाज सेवी अजीत सिंह का कहना है कि यह बहुत दुखद पहलू है कि यहां आने के बाद नेहरू जी का परिवार इंदिरा जी को तो याद करता है लेकिन फिरोज गांधी को याद नहीं कर पाता। कम से कम विशेष आयोजनों पर तो उन्हें याद करना ही चाहिए।
यदि प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के हाल की गतिविधियों पर नजर दौड़ाएं तो वे हिन्दुओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश में जुटी हुईं हैं कि कांग्रेस हिन्दुओं के हितों का ध्यान रखने वाली पार्टी है। कुछ समय पहले राहुल की वह तस्वीर तो सभी को याद ही होगी, जिसमें वह जनेऊ धारण किये हुए हैं। दोनों भाई – बहन को काफी देर बाद यह एहसास हो चुका है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के चक्कर में कांग्रेस पार्टी का बड़ा जनाधार समाप्त हो चुका है. वर्ष 2009 के चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के एंटोनी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कर दिया था कि मुस्लिम परस्त होना, पार्टी की हार का बड़ा कारण था। यही वजह है कि दोनों भाई – बहन यह मानकर चल रहे हैं कि मुसलमानों के पास तो कोई विकल्प है नहीं, वो विवश होकर कांग्रेस को ही वोट देगा। किसी तरह से हिन्दूओं को मना लिया जाय तो सत्ता में लौटा जा सकता है। मगर अब जनता के मन में यह बैठ चुका है कि ‘राजशाही खानदान’ के लोग चुनाव में सिर्फ लोक लुभावन वादा करते हैं और फिर अपने महलों में लौट जाते हैं। कांग्रेस ने आज़ादी के बाद अधिकतम समय तक इस देश में शासन किया और हर चुनाव में जनता को छला गया। चुनावी फायदे के लिए जो अपनी दादी को याद रखे और दादा को भूल जाय वह जनता का कितना भला करेगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
दो फूल को तरस गयी फिरोज की मजार:
फिरोज गांधी के ससुर, बीबी और बेटा प्रधानमंत्री थे। फ़िरोज़ गांधी का जन्म दिन 12 सितम्बर 1912 और मृत्यु आठ सितम्बर 1960 को हुई थी। इन दोनों तारीखों पर इस साल तो दूर कई सालों से कोई एक फूल भी चढ़ाने नहीं पहुंचता। उनका जन्म मुम्बई में हुआ था लेकिन जब वे आठ वर्ष के थे, तब उनके पिता जहांगीर का निधन हो गया था। इसके बाद 1920 में फिरोज गांधी और उनकी माँ रत्तीबाई प्रयाग में अपनी बहन के यहां आ गईं थीं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष एसपी पांडेय कहते हैं कि फ़िरोज़ गांधी भारतीय संसद के पहले और आखिरी सांसद थे, जिन्होंने केन्द्र सरकार के मंत्री के खिलाफ इतने तर्क और सबूतों के साथ मामले को उठाया कि जवाहरलाल नेहरू सरकार के वित्त मंत्री, तिरुवेल्लोर थट्टई कृष्णमचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। संसदीय इतिहास में इसे मूदणाकाण्ड के नाम से जाना जाता है। तब से आज तक कोई ऐसा सांसद नहीं हुआ जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी ही सरकार के मंत्री को इस्तीफे तक जाने को विवश कर दे। जवाहरलाल नेहरू ने इसके बाद फिरोज के लिए प्रधानमंत्री निवास तीन मूर्ती भवन में प्रवेश निषेध कर दिया था , जब कि वह सांसद भी थे और परिवार के एकलौते दामाद भी थे। गुनाह बस एक था कि सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े होने का उन्होंने साहस किया था। 8 सितम्बर 1960 की शाम अन्तिम बार तीन मूर्ति भवन कुछ समय के लिए लाया गया था – वहीं पर ससुर, पत्नी और बच्चों ने अन्तिम विदाई दिय़ा था.रायबरेली फिरोज गांधी की थी सीट:
भले ही पत्नी , पुत्र , पुत्रवधुओं और पौत्रों में से किसी एक की ओर से अगरबत्ती या पुष्प के लिए फिरोज की आत्मा आज तक प्रतीक्षा कर रही है लेकिन यह सभी जब चुनाव लड़ते हैं तो उन्हीं फिरोज की सीट रायबरेली और अमेठी से चुनाव लड़ते हैं। स्वयं इन्दिरा जी से लेकर आज तक फिरोज खानदान के वारिस, फिरोज गांधी की ही सीट से ही चुनाव लड़ते हैं। फिरोज के बाद और इन्दिरा जी के बीच रायबरेली सीट पर बैजनाथ कुरील सांसद रहे हैं।







