गृहविषयक:
घर से बाहर अब कोई कार्यक्रम नहीं है।
मैं अब बराबर घर के ही कार्य और क्रम में हूँ।
यह किराए का घर है।
एक किराए के घर में जन्म से ही रहने और रहते चले जाने से, एक सजग व्यक्ति के भीतर एक विशुद्ध वैराग्य स्वतः ही रूप लेने लगता है। यह देह भी एक किराए का घर लगने लगती है, जन्म से ही एक किराए के घर में रहती हुई। यों लगता है कि जैसे किसी सर्वोच्च सत्ता ने यह सारा संसार ही किराए पर चढ़ाया हुआ है।
इस अर्थ में किराए पर चढ़े हुए संसार में, एक किराए के घर में रहने और उसे बराबर बदलते रहने के संघर्ष से; रूप ले चुका विशुद्ध वैराग्य वृद्ध होता जाता है।
एक घर दूसरे घर से बेहतर नज़र आता है। कोई स्थानीयता व्यथित नहीं करती। कोई स्मृति व्याकुल नहीं करती। कोई मोह सताने का साहस नहीं करता। जिस घर में जन्मे और जिन घरों में संबंधों, रंगों, वस्तुओं, अक्षरों, शब्दों, वाक्यों, व्यक्तियों, भाषाओं और संसार को पहचानना सीखा; उन घरों में दुबारा जाने-झाँकने का मन नहीं करता।
घर-घर खेलते हुए बच्चों वाले घर। गझिन आबादी वाले एक कमरे के घर। कवरेज क्षेत्र से बाहर के घर। घर जिनमें आँगन, छतें, बालकनियाँ और खिड़कियाँ नहीं थीं, कभी-कभी दरवाज़े भी—काई से भरे ग़ुस्लख़ाने और सीलन से भरी दीवारों वाले घर—सूर्य के प्रकाश से वंचित—बारिशें न चाहने वाले घर। कभी रहे हैं आप उनमें? अगर रहे हैं तो आप उनकी महक भूल नहीं सकते, लेकिन भूल जाते हैं।
बदलाव के नियम बलवान हैं।
घर जिनमें है के सिवा कुछ और नहीं है। बेहिसाब अकेलेपन से भरे हुए घर। घर जिनमें सोती हुई देह पर से चीटियाँ, तिलचट्टे, कनखजूरे, चूहे और छिपकलियाँ गुज़रते रहते हैं। घर जिनमें केवल एक ही संगीत होता है और जिसे केवल मच्छर ही रच सकते हैं। फिर भी नामालूम वह कौन-सी प्रेरणा है जिसके वशीभूत हो वे घर, घर ही लगते हैं, नर्क नहीं; जहाँ किसी कथा के कुछ पन्ने पलटते-पढ़ते हुए नींद आ जाती है, जो कभी भी खुल सकती है—कविता की तरह—समाचारों से डरी हुई। घर जिन तक हम हमेशा हर हाल में जाना चाहते हैं, क्योंकि संसार हमें बुरी तरह थका चुका होता है और हम इस थकान को उतार फेंकना चाहते हैं।
फिर एक रोज़ घर ही हमें थकाने लगता है और तब इस तरह की थकान को हम कहाँ उतारें कुछ समझ में नहीं आता, क्योंकि घर से बाहर अब कोई कार्यक्रम नहीं है।
मैं रेगमाल से रगड़ रहा हूँ अपने तलवे कि उन्हें यात्राओं की याद न आए।
मैं संशय से देख रहा हूँ घर के दरवाज़े—संसार की तरफ़ खुलते हुए।
मैं घर में रहना चाहता हूँ।
मैं नष्ट हो जाऊँगा इसके बग़ैर, जैसे था ही नहीं।
– अविनाश मिश्र







