नहीं रही अब गांव में वह पहले वाली बात!

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file photo

इतनी जल्दी बदल गए
कैसे अपने जज्बात?
नहीं रही अब गांव में
वह पहले वाली बात!

ननद और भौजाई जहां
मिल गीत फागुनी गाती थी
गालों पर एक दूसरे के खूब
अबीर गुलाल लगाती थी
स्वास्तिक और तोरण से
जहां द्वार सजाए जाते थे
टेसू के फूल बाजारों से
घर-घर में मंगाए जाते थे
हर उपले में रहती थी
अजिया के हाथों की छाप।
नहीं रही अब गांव में
वह पहले वाली बात!

तोता और मैना, बैलों
की जोड़ी खूब सुहाती थी
गले में बंधे घुंघरू घुंघुरुओं से
रुनझुन रुनझुन ध्वनि आती थी
गौशाला की बदौलत घर में
दूध दही की बहारें थी
मटकी और मथानी की
आंगन में लगी कतारें थीं
सिंहनी के दांतो को गिनने की
हर बच्चे में थी औकात

नहीं रही अब गांव में
वह पहले वाली बात

  • अमरेश सिंह

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