कृष्णा सोबती का जाना

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जिस तरह से कृष्णा सोबती अपने 94वें जन्मदिन से 24 दिन पहले हम सबको अलविदा कह गयीं वह बेहद दुखद है कृष्णा सोबती को हिंदी साहित्य की बेमिसाल लेखिका कहा जाता है।

कृष्णा सोबती की वेशभूषा के बारे में बात करें तो वह हंसता हुआ चेहरा और वह बिंदासपन वाकई कमाल था। जब वे बोलती थीं तो मन करता था कि बस उन्हें घंटों सुनते ही जाओ। कृष्णा सोबती की कहानी ‘सिक्का बदल गया’ स्कूल के दिनो में पढ़ी थी और उसके कैरेक्टर शाहनी और शेरा जेहन में रचे-बसे थे। उनकी कृति विभाजन की पीड़ा कहानी की तो जान थी।

जिस किसी ने 94 साल की उम्र में अस्वस्थता के बावजूद 1 नवंबर 2015 को दिल्ली के मालाबंकर सभागार के मंच तक व्हीलचेयर पर आई और व्यवस्था के प्रति अपना प्रतिरोध दर्ज कराती कृष्णा सोबती को देखा या सुना होगा उसे कृष्णा सोबती के होने का मतलब बताने की जरूरत नहीं।

उस दिन सोबती ने न सिर्फ मौजूदा हालात के खिलाफ विरोध का स्वर बुलंद किया था बल्कि सत्ता से धीरे-धीरे सीधे-सीधे कुछ सवाल भी पूछे थे वह लेखकों संस्कृतिकर्मियों पर चारों ओर से हो रहे हमले से छुब्ध और आक्रोश भरे स्वर में कहा था जिन लोगों का साहित्य से कोई परिचय ही नहीं है। जिन्हें भारतीयता का कोई बोधि ही नहीं है। वे लेखकों को भारतीयता सिखाएं और उनके विरोध को मैनुफै्क्चर्ड बताएं हमारे समय की इससे बड़ी कोई दूसरी विडंबना नहीं हो सकती।

कृष्णा सोबती का यह गुस्सा तब भी दिखा था, जब 2010 में उन्होंने पदम भूषण सम्मान देने की भारत सरकार की पेशकश ठुकरा दी थी कि एक लेखक के तौर पर मुझे सत्ता प्रतिष्ठान से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी और आम आदमी के पक्षधर में मुखर रहने वाली वह आवाज अब हमारे बीच नहीं है।

आज के दौर में, जब शब्दों की अर्थव्यवस्था संकट में हो, कृष्णा सोबती ऐसी रचनाकार थी, जिन्होंने शब्दों की शक्ति को न सिर्फ कमजोर होने से बचाया बल्कि उन्हें नए सिरे से सशक्त किया। उनके लेखन के एक- एक शब्द के पीछे सच्चाई और साहस का आधार है जो किसी के रोब में झुकना नहीं जानता।

नामवर सिंह ने बिल्कुल सही कहा है कि सोबती शब्दों को अपनी जिंदगी की तरह जीती रहीं। उन्होंने हिंदी के मर्द वादी लेखकों को एक नया मुहावरा दिया जो स्त्रीवादी लेखन की प्रचलित परिपाटी और प्रचलित मुहावरे से कहीं अलग था लेकिन उन्होंने खुद को कभी स्त्रीवादी लेखन के चौखट में रखना मंजूर नहीं किया। उनके लेखक का मतलब लेखक था। जिसे किसी तमगे की जरूरत नहीं थी।

एक बड़ी रचनाकार होने के साथ-साथ वह अपने समय समाज से अलग न रहकर सीधे-सीधे जिस तरह हस्तक्षेप करती थी। उनके समूचे रचनात्मक अवदान को देखते हुए कहा जा सकता है कि वह हमारे हिंदी समाज के लिए आज के दौर में अंतरआत्मा की आवाज़ थी। वह बेजोड़ और साहस की ऐसी प्रतीक थी जिनमें अपने बौद्धिक बेलगाम और साहस पूर्ण हस्तक्षेप के साथ समाज में पब्लिक सामंजस्य की भूमिका का निर्वाहन किया। यह अनायास नहीं था कि 94 वर्ष की उम्र में 2017 में जब उन्हें साहित्य के क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान पुरस्कार देने की घोषणा हुयी तो समूचे समाज ने देर से दिया गया सम्मान कहा ।

उन्हें उनके उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ के लिए वर्ष 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और 1996 में एकेडमी के साहित्य अकैडमी के उच्तम सम्मान साहित्य अकादमी फेलोशिप से नवाज़ा गया ।हाल ही में प्रकाशित बंटवारे की पृष्ठ्भूमि पर लिखा गया उपन्यास ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान विभाजन पर तक लिखे गए तमाम उपन्यासों में अलग साबित हुआ है वह उस मौलिक ऊर्जा मौखिक मुहावरे के साथ हर बार बड़े समाज के समक्ष उपस्थित होती रहीं उनकी वह उपस्थिति और ऊर्जा उनके शब्दों के रूप में हमारे साथ बनी रहेगी।

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