Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 485 मेरे खिलाफ, सब साजिशें तेरी जानता हूं। पीढ़ी दर पीढ़ी, खून चूसने की कोशिशें तेरी जानता हूं। मैं से हम न हुए, इसलिए दुनिया में दस्तूर हूँ। मजबूर हूँ। मैं मजदूर हूँ। गौतम ग़ाज़ीपुरी
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन