नकली और बनावटी कहानियों की भीड़ और शोरगुल के बीच कभी कोई अच्छी और सधी हुई कहानी पढ़ने-सुनने को मिल जाती है तो बड़ा सुकून मिलता है। पिछले दिनों जनसुलभ पुस्तकालय के लाइव कथा पाठ में कमलेश की कहानी बांध सुनकर दंग रह गया। बाढ़ को लेकर कुछ कहानियां पहले भी लिखी गई हैं लेकिन यह कहानी उन सबसे अलग है।
यह बाढ़ के जरिए न सिर्फ हमारे ग्रामीण जीवन की त्रासदी को उभारती है बल्कि मानवीय संवेदनाओं का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करती है। इसे सुनते हुए एक तरफ मुझे अचानक ही मार्खेज के लव इन दि टाइम औफ कौलरा की याद आई ( हालांकि दोनों में कोई साम्य नहीं है लेकिन एक बात दोनों को जोड़ती है-आपदा के समय प्रेम) दूसरी तरफ रेणु की कई कहानियां जेहन में कौंध गई। मैं यह कहानी सुनकर कमलेश का कहानी संग्रह दक्खिन टोला पढ़ने के लिए उत्सुक हो उठा और जब मैंने इसे पढ़ना शुरू किया तो एक बैठक में खत्म करके ही उठा।
वर्षों बाद मुझे एक ऐसा कहानी संग्रह मिला जिसकी हर कहानी अगली कहानी पढ़ने को बाध्य करती है। मुझे इसे पढ़कर लगा कि बहुत दिनों बाद हिंदी में एक ऐसे कहानीकार का आगमन हुआ है जो समाज के सबसे कमजोर वर्ग के जीवन को न सिर्फ भलीभांति जानता है, बल्कि उसके प्रति गहरी सहानुभूति और संवेदना रखता है। यह सहानुभूति किसी फैशन या विमर्श के दबाव में अर्जित नहीं की गई है। यह सहज और स्वाभाविक है क्योंकि कमलेश ग्रामीण जीवन में रचे-बसे रहे हैं और सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों का हिस्सा रहे हैं। उनकी प्रतिबद्धता और राजनीतिक दृष्टि स्पष्ट है। पिछले कुछ समय में हिंदी कविता में राजनीतिक स्वर मुखर हुआ है और कहा जा सकता है कि राजनीतिक कविताओं की वापसी हुई है। लेकिन हिंदी में राजनीतिक कहानियों की धारा सूखने लगी थी। कमलेश की कहानियों को बेझिझक राजनीतिक कहानियां कहा जा सकता है। इस तरह कमलेश के जरिए राजनीतिक कहानियों की वापसी हुई है। यही नहीं ग्रामीण जीवन एक बार फिर नए सिरे से उपस्थित हुआ है।
पिछले करीब एक डेढ़ दशकों में हिंदी कहानियां महानगरीय मध्यवर्ग के इर्द-गिर्द ही घूमती रही हैं या फिर नौस्टैल्जिया में फंसी रही हैं। वैसे दो-तीन वरिष्ठ कथाकारों (मैं उनके नाम नहीं ले रहा क्योंकि एक तो मैं उनके लेखन के प्रति सम्मान रखता हूं दूसरे, किसी प्रतिष्ठित लेखक की पगड़ी उछाल कर खुद को चर्चा में लाने की ओछी हरकत मैं नहीं करता) ने लगातार गांवों को अपना विषय बनाया है। उनकी कहानियों और कमलेश की कहानियों में एक बड़ा फर्क है। वरिष्ठ कथाकारों की अधिकतर कहानियों में न तो ग्रामीण परिवेश की झलक मिलती है न ही जीवन का राग तत्व।
उन कहानियों पर विमर्शों और लेखक के अजेंडे का इतना दबाव रहता है कि वे निष्प्राण हो जाती हैं। जीवन के स्पंदन से रहित वे कहानियां न्यूज फीचर या फिल्मी स्क्रिप्ट लगती हैं। गरीब आदमी हर समय अपनी गरीबी का रोना नहीं रोते रहता, न ही वह हर समय लड़ने के बारे में सोचता रहता है। वह भी खुशी के मौके ढूंढता है, प्रेम करता है, त्योहार मनाता है और अपने हक के लिए लड़ता भी है। रेणु की कहानियां इसलिए प्रभावित करती हैं कि वे एक निर्धन व्यक्ति के जीवन को समग्रता में चित्रित करते हैं। उनमें राग-विराग दोनों है। कमलेश में यही बात है।
उनकी कहानी में भूमि संघर्ष में लगे सशस्त्र दल का कमांडर हर समय क्रांति का उपदेश नहीं झाड़ता, वह खंजड़ी बजाकर गाता है, एक लड़की के आकर्षण में फंसता है, अपने संघर्ष को लेकर द्वंद्व में भी पड़ता है, लेकिन उसकी लड़ाई कमजोर नहीं पड़ती। वह पूरी ताकत से लड़ता हुआ मारा जाता है। मेरा मानना है कि वैचारिक प्रतिबद्धता से भी ज्यादा जरूरी चीज है लेखकीय ईमानदारी। कई बार लेखक को अपने विचार और सोच के विरुद्ध जाने का भी साहस दिखाना पड़ता है।
मार्क्सवाद से प्रभावित होने के बाद भी कमलेश ने वामपंथी पार्टियों के विचलन को अनदेखा नहीं किया है। उनकी कहानी गड़हा में शिवरतन महतो एक भूतपूर्व कौमरेड हैं जो ब्लौक औफिस के दलाल बन चुके हैं और गांव में शौचालय बनवाने के लिए कमीशन मांगते हैं। अपनी पत्नी को मुखिया के चुनाव में जितवाकर उसका सारा काम वे खुद करते हैं।
कमलेश की पैनी नजर गांव के बदलते यथार्थ पर है। वे शोषक वर्ग के बदल रहे चरित्र को बखूबी पहचानते हैं। वे इस बात को स्पष्ट रेखांकित करते हैं कि राजनीति में ब्राह्मणवाद का विरोध करने वाले पिछड़े भूस्वामी भी सवर्णों की तरह ही दलितों का उत्पीड़न करते हैं। अपने को समाजवादी कहने वाले पिछड़े नेता ही नहीं कलाकार भी मुसहरों के प्रति हिकारत का भाव रखते हैं। यह महज संयोग नहीं है कि कमलेश की ज्यादातर कहानियों के नायक मुसहर हैं जिन्हें हर तरफ से उपेक्षा, अपमान और प्रताड़ना मिलती है। इसलिए अंततः उनमें से कई हथियार उठा लेते हैं। लेकिन इसके साथ कमलेश की कहानियों में लहलहाती फसलें हैं, चमकदार सुबहें हैं, काली रातें हैं, नदियों की उफनती धारा है, त्योहार हैं, मेले हैं, नाच है गाना है, खंजड़ी, डफ और नगाड़े हैं, आल्हा है, बिरहा है, रोमांस है। कमलेश अपने अनुभव को और समृद्ध बनाएं और लगातार विकास करें तो हिंदी कहानी को नया मोड़ दे सकते हैं। – संजय कुंदन जी कि वॉल से







