हम तो बंधन में रहे
उड़ना गए थे भूल।
तुमको क्या कठिनाई थी
जो इतना हो गए दूर।।
धुंधला धुंधला दिख रहा
बाहर उड़ती धूल।
मुरझाए हैं बगिया में
जितने भी थे फूल।।
एक वेदना भीतर है
जीवन का दस्तूर।
जिनसे कुछ उम्मीद थी
वही हो गए शूल।।
– दिलीप अग्निहोत्री







