पालघर की घटना पर
वरिष्ठ पत्रकार नवेद शिकोह
की तीन रचनाएं
पालघर ने बता दिया जो तुम महसूस ना करते थे,
पाल के घर में सांप ना रखो ये अपनों को डसते हैं।
इनका मज़हब नहीं कुछ भी ये वहशी है जहरीले हैं,
हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई सब से ये नफरत करते हैं।
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ज़ात तो पूछो साधू के क़ातिल की
इस ज़ुल्म से लड़ना है, इस मौत पर रोना है,
अब भीड़ की दहशत को हरग़िज़ नहीं सहना है।
हम ईट बजा देंगे, ज़ालिम को मिटा देंगे,
निर्दोष के बदले का मौक़ा नहीं खोना है।
क़ातिल के मज़हब से ही करना है तय हमको,
ख़ामोश ही रहना या हंगामा खड़ा होना है।
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सबके साधू
अख़लाक, तबरेज़, पहलू और साधू,
भारत मां का कोई दायां था कोई बायां बाजू।
ग़म सब का है हमें सबको रोयेंगे बराबर से,
सब आंखों के तारे थे बन गये आंखों के आंसू।
- नवेद शिकोह







