कमीज़ ख़रीदने गया था
बाज़ार में
दुकान भव्य थी
वहाँ काम कर रहे
नवयुवक से पूछा :
‘अगली बार मिलेंगे
आपका ट्रांसफ़र
तो नहीं होगा ?’
उसने हिम्मत से
हँसकर जवाब दिया :
‘नौकरी का ही
ठिकाना नहीं है’
जिसे हम
उदारीकरण कहते हैं
अनुदारता है
निजीकरण हिंसा है
रईसों की
हर एक व्यक्ति के विरुद्ध
हम सहारा नहीं दे सके
नौजवानों को
उन्हें उत्पीड़न के सम्मुख
लगातार
निष्कवच ही बनाया है
कमीज़ अच्छी मिल गयी
मगर गुनहगार की तरह लौटा

– पंकज चतुर्वेदी







