गौर फरमाएं
पत्नी कहतड़ी पति से–
अब ऊ जमाना बहुत दूर गईल,
जब चुटकी भर सिंदूर से बन जात रहनी भगवान।
सुन लीं काल्ही करवा चौथ ह,
आज से ही संभाल लीं चऊका-बर्तन क काम।
अब आप भगवान ना,
एगो हमार मित्र बानी।
यदि गड़बड़ भईल कुछ त,
एक झपड़ा में याद आ जईहें नानी।
आपक जिंदगी तब तक ही बा,
जब तक हमार आप पर बा मेहरबानी।।
बहरा-भीतर हमहूँ जाईना,
ईहां हमरो बा बहुत पहचान।
बाजार से जरूर ले ले आइब झुमका,
हमार ना होखे के चाही अपमान।
पचास हजार काल्ही चाही हमके,
बहाना ना बनाईब कि थईली में ना बा दाम।
एतना सुनी के पति देव हो गईल बाड़न परेशान।
भाई जी, बदल जा काहें मानतड़ अपना के भगवान।
सही त कहतड़ी तोहार मेहरिया,
तू ओकर जिंदगी क सच्चा मित्र हउव,
आखिर तू हूं त हउव एगो इंसान।
- उपेन्द्र नाथ राय







