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    पूर्ण वैज्ञानिक है भारतीय नववर्ष!

    By March 17, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    संदर्भ-वर्ष प्रतिपदा/नवसंवत्सर

    पूनम नेगी

    भारतीय संस्कृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सर्वाधिक महत्वपूर्ण तिथि है। “ब्रह्मपुराण” में उल्लेख है- चैत्रमासे जगद्ब्रह्मा ससर्ज पृथमेहनि, शुक्ल पक्षे समग्रन्तु तदा सूर्योदये गति। यानी प्रतिपदा तिथि ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचनाकर मानव की उत्पत्ति की थी। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी शुभ तिथि को सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए प्रथम भारतीय पांचांग की रचना की थी। जहां एक ओर दुनिया के अन्य देशों में नया साल मनाने का आधार किसी व्यक्ति, घटना व स्थान से जुड़ा है और विदेशी लोग अपने नववर्ष अपने देश की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार मनाते हैं; मगर हमारा भारतीय नववर्ष ब्रह्मांड के अनादि तत्वों से जुड़ा है। ग्रह- नक्षत्रों की गति पर आधारित हमारा नववर्ष सबसे अनूठा और सर्वाधिक वैज्ञानिक है। जानना दिलचस्प होगा कि भारतीय ज्योतिष के विद्वानों ने वैदिक युग में बता दिया था कि अमुक दिन, अमुक समय से सूर्यग्रहण होगा। यह कालगणना युगों बाद भी पूरी तरह सटीक साबित हो रही है। यह इतनी सामंजस्यपूर्ण है कि तिथि वृद्धि, तिथि क्षय, अधिक मास, क्षय मास आदि व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाते, तिथि घटे या बढ़े, लेकिन सूर्यग्रहण सदैव अमावस्या को होगा और चन्द्रग्रहण सदैव पूर्णिमा को ही होगा।

    भारतीय मनीषी भास्कराचार्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “सिद्धांत शिरोमणि” में लिखा है, “भारत में प्रचलित सभी संवत चैत्र-शुक्ल प्रतिपदा से ही आरंभ हुए। विक्रमी संवत कलि संवत के 3044 वर्ष बाद, शक शालिवाहन संवत के 135 वर्ष पूर्व और ईसवी संवत के 57 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ। वर्तमान के प्रचलित संवतों में सबसे प्राचीन युगाब्द माना जाता है जो कलियुग का आरंभ का सूचक है। इसे पांच हजार से अधिक वर्ष हो चुके हैं। सनद रहे कि भले ही हमारे राजकीय कार्य शक संवत के अनुसार होते हों मगर आम जनमानस में समाजिक कार्यों के लिए विक्रमी संवत ही स्वीकार्य है। हम अपने सभी शुभ कार्य इसी भारतीय पांचांग के अनुसार करते हैं। शुभ कार्यों के पूजन मंत्र में भारतीय कालगणना का उल्लेख में भरतीय मनीषा के उत्कृष्ट काल चिंतन का परिचायक है। मंत्र है – ॐ अस्य श्री विष्णु राज्ञया प्रवर्त्य मानस व्रहमणो द्वितीय परार्द्धे, श्वेतवाराह कल्पे, वैवस्वत मनवन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे भरतखण्डे अमुक नाम, अमुक गोत्र आदि पूजनं/आवाहनम् करिष्यामि।

    बताते चलें कि प्राचीन भारत के सर्वाधिक यशस्वी सम्राट विक्रमादित्य ने आक्रमणकारी शकों को परास्त कर भारतभूमि से निकाल बाहर कर जिस दिन “शकारि” की उपाधि धारण की थी, वह तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की थी। शास्त्रीय उल्लेख बताते हैं कि भारत के दिग्विजयी सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी समूची प्रजा को कर मुक्त करने के साथ ही अनेक जनहितकारी कार्यकर “धर्म संसद” से अपने नाम का संवत चलाने का गौरव हासिल किया था। सम्राट विक्रमादित्य ने न सिर्फ द्वादश ज्योतिर्लिंगों का पुनरुद्धार कराया वरन अयोध्या में राम मन्दिर का पुनर्निर्माण भी। उन्होंने भारत की पश्चिमी अन्तिम सीमा पर हिन्दूकुश के पास प्रथम शक्तिपीठ हिंगलाग भवानी का मन्दिर बनवाया और  असम में कामाख्या देवी का। यही नहीं, उन्होंने असम से हिन्दूकुश (पेशावर) तक विशाल सड़क मार्ग का निर्माण कर इन दोनों शक्तिपीठों को आपस में जोड़ दिया। अखंड भारत के इस महानतम राजा ने राष्ट्र की सीमाओं को सामरिक दृष्टि से भी सुरक्षित किया। इन महान राष्ट्रहितकारी कार्यों के बदले उपकृत राष्ट्र ने अपने प्रिय सम्राट के नाम पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नयी विक्रमी संवत को अंगीकृत कर उन्हें “विक्रमादित्य” की पदवी से सुशोभित किया था।

    Related imageगौरतलब हो कि 18वीं व 19वीं सदी में कुछ यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिकता पर अविश्वास का वातावरण बनाया था मगर बीते दिनों नासा ने 120 करोड़ रूपये खर्च कर है साबित कर दिखाया है कि कालगणना की भारतीय ज्योतिष की मान्यता उचित व मान्य है। भूगर्भीय क्षेत्र में निरंतर हो रहे अनुसंधानों के कारण देश दुनिया के वैज्ञानिक भी अब यह  स्वीकार करने लगे हैं कि मानवीय सृष्टि की प्राचीनता मानव की कल्पनाशक्ति से परे है। वे अब भारतीय कालतत्व के विशेषज्ञों की मान्यता पर सहमति जता रहे हैं। भूगर्भीय क्षेत्र में हो रहे पाश्चात्य वैज्ञानिकों के अनुसंधानों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार मानवीय सृष्टि की प्राचीनता 6-7 हजार वर्ष के बजाए अब 20 हजार वर्ष के निकट जा पहुंची है। इससे पाश्चात्य विद्वानों की पूर्व अवधारणा कि यह विश्व 6-7 हजार वर्ष पूर्व बना था, धराशायी हो जाती है।

    इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि हमारी वर्तमान की युवा पीढ़ी अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान के सर्वोत्कृष्ट प्रतीक और विशुद्ध वैज्ञानिक भारतीय नववर्ष की गौरव गरिमा से अनभिज्ञ हैं। इसके पीछे है देशवासियों की गुलाम मानसिकता। अंग्रेजों ने देश में शासन के दौरान बड़ी चालाकी से शिक्षा नीति को बदल कर हमारे मनों में अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रति हीन भावना कूट कूट कर भर दी थी। नतीजतन भले ही अंग्रेज चले गये मगर हमारी मानसिकता अंग्रेजियत की पिट्ठू बनी रही। इस साजिश की तस्कीद करता है मैकाले का वह खत जो उसने 12 अक्तूबर 1836 को अपने पिता को लिखा था। उक्त पत्र में उल्लेख मिलता है कि आगामी 100 साल में भारत के लोग रूप और रंग में तो भारतीय दिखेंगे किन्तु वाणी, विचार और व्यवहार में अंग्रेज हो जाएंगे। सचमुच ही आज हमारे जीवन में अंग्रेजियत पूरी तरह हावी हो गयी है। हमारे वेशभूषा, भाषा ही नहीं जन्मदिन, पर्व-त्योहार, विवाह संस्कार आदि समारोहों को मनाने के तौर तरीकों में भी।

    आज जरूरत है इस भूल को सुधारने की। शक्ति की आराधना के विशिष्ट साधनाकाल चैत्र नवरात्र का शुभारम्भ हमारे भारतीय नववर्ष यानी वर्ष प्रतिपदा से होता है। भगवान श्रीराम व सम्राट युधिष्ठिर ने इसी दिन राजसत्ता संभाली थी। संत झूलेलाल व गुरू अंगददेव जयंती तथा आर्यसमाज का स्थापना दिवस; हमारे भारतीय नववर्ष से हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के अनेकानेक प्रसंग जुड़े हैं। जरूरत इस बात की है कि भारत अपने आत्मगौरव को पहचाने तथा अपने नववर्ष को धूमधाम से सामाजिक और राजकीय स्तर पर मनाये जाने का प्रबन्ध करें। इस वर्ष हमारा भारतीय नवसंवत्सर (विक्रमी संवत) 2075 का शुभारम्भ 18 मार्च से हो रहा है। तो आइए इस सुअवसर पर हम सब देशवासी मिलकर अपने भारतीय नववर्ष को पूरे भावश्रद्धा से मनाएं ताकि हमारी आगामी पीढ़ी भारत की अमूल्य परम्पराओं की वैज्ञानिकता से अवगत हो सकें।

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