डॉ दिलीप अग्निहोत्री
उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग को पूरी तरह सनकी माना जाता है, तो उनके अमेरिकी समकक्ष ट्रम्प आंशिक रूप में वैसे ही है। ऐसे में दोनों की वार्ता को लेकर बड़ा संशय था। यह आशंका बाहरी नही थी, बल्कि ट्रम्प और किम ने खुद ऐसे बयान दिए थे। दोनों ने कहा था कि मिजाज न मिला तो वार्ता शुरू होते ही खत्म हो जाएगी। ऐसे तल्खी के आलम में दोनों की बात पचास मिनट चली। यह ट्रम्प जोंग सन्योग का ही कमाल है। दोनों फिर मुलाकात के लिए सहमत हुए, यह राहत का विषय है। दोनो देशों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर भी किये गए। संयुक्त रूप से वार्ता के क्रम को जारी रखने पर सहमति बनी। विश्व के लिए यह राहत की खबर है। इससे उम्मीद जगी है कि किम अब कोई परमाणु या मिसाइल परीक्षण नहीं करेंगे। कुछ समय पहले एक दूसरे को बर्बाद करने की धमकी देने वाले दोनों शासक इतनी जल्दी शांति की मेज पर आ जायेंगे इसकी उम्मीद नहीं थी। ज्यादा समय नहीं हुआ किम जोंग ने अपनी सनक में तीसरे विश्व युद्ध का खतरा सामने ला दिया था। मिसाइल और परमाणु परीक्षण करके वह बच्चों की तरह उछलते थे। इसके बाद सीधे अमेरिका को नेस्तनाबूत करने की धमकी देते थे। फिर इतना बदले कि शांति के पुजारी दिखाई देने लगे।दूसरी तरफ उनके अमेरिकी समकक्ष उनसे कुछ ही कम है। डोनाल्ड ट्रम्प को पूरा नही आंशिक तो माना ही जा सकता है। वह भी अक्सर ऐसे चौकाने वाले फैसले करते है, जिसकी उम्मीद किसी सामान्य मानसिकता के शासक से नहीं कि जा सकती। कम ही समय में उनके ऐसे कार्यो की लंबी सूची बन गई है। मुस्लिम मुल्कों के प्रति सख्ती, येरुशलम आदि पर उनके निर्णय चौकाने वाले थे, लेकिन बाद में इन्हें वापस लेना पड़ा। इसके अलावा ट्रम्प पेरिस जलवायु सहित कई अंतरराष्ट्रीय समझौते तोड़ चुके है। वह एकाएक किसी वार्ता से अपने को अलग करके बाहर आ जाते है। इस वार्ता से ठीक पहले वह कनाडा में थे। यहां जी सेवेन शिखर सम्मेलन में साझा बनाने तक वह साथ थे लेकिन जब उसे जारी करने का समय आया तो ट्रम्प सिंगापुर कूच कर गए। उन्होंने अपने को इस सम्मेलन से अलग कर लिया। इतना ही नही,वहां उनका विवाद कनाडा से हुआ था लेकिन वह भारत को भी कोसने लगे थे। वह इस बात से खफा थे कि भारत ने भी आयात शुल्क बढा दिया है।
उन्नीस सौ पचास से लेकर उन्नीस सौ तिरपन तक हुए कोरियाई युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच यह पहली शिखर वार्ता थी। किम ने ट्रंप को जुलाई में दूसरी मुलाकात के लिए उत्तर कोरिया आने का न्योता दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर दोनों नेताओं की दूसरी वार्ता भी हो जाती है तो तीसरी मुलाकात वॉशिंगटन में होगी। उत्तर कोरिया ने ठीक कहा कि यहां तक पहुंचना आसान नहीं था। अमेरिका के साथ जिस प्रकार की तल्खी थी, उसमें वार्ता का होना किसी उपलब्धि से कम नहीं है। कुछ दिन पहले दोनों नेता एक दूसरे को देख लेने की धमकी वाली शैली में बोल रहे थे, फिर दोनों तरफ से कहा गया कि वार्ता होगी लेकिन बात नहीं जमी तो पांच मिनट में इसे समाप्त कर दिया जाएगा। ट्रम्प ने कहा था कि वह पांच मिनट में किसी की असलियत जान सकते है। किम ने बात नहीं मानी तो वह बाहर आ जायेंगे। किम भी पीछे कहा रहते। बोले की वह पांच सेकेंड में किसी की असलियत पहचान लेते है। ऐसे दोनों नेताओं के बीच करीब पचास मिनट तक बातचीत हुई।
ट्रंप ने कहा कि हमारी चर्चा और रिश्ते शानदार होने वाले हैं। दरअसल दोनों देशों की बीच इस बैठक का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाना और कोरियाई प्रायद्वीप में पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण है। यह पहली शिखर वार्ता ट्रंप और किम के रिश्तों को सामान्य बनाएगी।
वार्ता की पूर्व संध्या पर अमेरिका ने परमाणु निरस्त्रीकरण के बदले उत्तर कोरिया को विशिष्ट सुरक्षा गारंटी की पेशकश की है। इतना अवश्य है कि कार्य और बयान के स्तर पर दोनों देशों को संयम दिखाना होगा। यदि जोंग का वास्तव में हृदय परिवर्तन हुआ है, तो उन्हें अन्य क्षेत्रों में भी इसके प्रमाण देने होंगे। उन्होंने अपने मुल्क की विशाल संपदा पर अपना कब्जा जमाया है। खनन जैसे कई श्रोतों की आमदनी सरकारी खजाने की जगह उनके निजी खाता में पहुंच जाती है। गरीबी और बेरोजगारी का ग्राफ ऊंचा है। इसलिए श्रम सस्ता है। चीन इसका भी फायदा उठाता है। वह उत्तर कोरिया में निर्मित सस्ते समान लेकर मुनाफे के साथ अन्य मुल्कों में खपा देता है। ऐसे में वह नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध जारी रहे।
यह समझना होगा कि यह मसला केवल द्विपक्षीय नहीं है। इसमें चीन की भूमिका से भी सावधान रहना होगा। उत्तर कोरिया को अभी तक चीन का ही संरक्षण और सहायता मिल रही थी। उसके सीधे अमेरिका, जापान को धमकी देने का यही कारण था। लेकिन जब बात विश्व युद्ध तक पहुंच गई, तब चीन सावधान हुआ। वह विश्व युद्ध की नौबत नहीं चाहता था। स्थिति संभालने के लिए चीन ने जोंग को अमेरिका से वार्ता को राजी किया। जोंग के हृदय परिवर्तन का यही कारण था। सिंगापुर में ट्रम्प से वार्ता के पहले जोंग की चीनी राष्ट्रपति से वार्ता हो चुकी थी। सिंगापुर भी वह चीन के ही विमान से पहुंचे थे। जाहिर है कि जोंग की नकेल चीन के हाँथ में है। चीन अपनी सुविधा से उसे कभी ढीला करेगा, कभी कसेगा। इससे विश्व को सावधान रहना होगा।







