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    कर्नाटक में कांग्रेस का कुटिल कदम

    By April 4, 2018 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    कर्नाटक में पांच वर्ष तक शासन करने के बाद भी कांग्रेस उपलब्धियों के नाम पर खाली हाँथ है। यह विरोधियों का आरोप नहीं उसकी खुद की कवायद से उजागर हुआ। अब वह धर्म विभाजन के आधार पर अपनी सत्ता बचाने का अंतिम प्रयास करेगी। विधानसभा के कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित किया। कांग्रेस की त्रासदी समझी जा सकती है। देश के करीब सात प्रतिशत इलाके और चार राज्यों में उसकी सत्ता बची है। इसमें कर्नाटक भी है। इसके लिए वह विभाजनकारी चाल चलने में संकोच नहीं किया। वैसे प्रायः यह देखा गया है कि चुनाव के समय इस प्रकार के कदम का कोई लाभ नहीं मिलता।
    ऐसा करने वाली सरकार आमजन को नासमझ मान कर चलती है। जबकि नासमझी सत्ता में बैठे लोग ही करते है। यदि लिंगायत के प्रति ऐसी हमदर्दी थी, तो इसके लिए चुनाव के ठीक पहले का समय क्यों चुना गया। मतलब साफ है, कांग्रेस की सरकार जानती है कि वह विभाजन के इस प्रस्ताव पर अमल करने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में इसका दोहरा नुकसान होगा। एक सरकार की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यह माना जायेगा कि उसके पास अपनी उपलब्धियां बताने के लिए कुछ नहीं है। दूसरा यह कि इतने हल्के ढंग से यह विषय उठाने से लिंगायत समुदाय भी खुश नहीं हो सकता। क्योकि यह विशुद्ध राजनीतिक चाल है।
    इसके अलावा सिद्धरमैया को यह भी बताना चाहिए कि 2013 में जब केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया था, तब पुनः उसे लाने की क्या आवश्यकता थी। क्या यह माना जाए कि राहुल गांधी की कमान में कांग्रेस ऐसे ही हथकंडों से चुनाव जीतने का प्रयास करेगी। गुजरात में जनेऊ धारी ब्राह्मण, पूर्वोत्तर में चर्च से नजदीकी और कर्नाटक में धर्म के आधार पर विभाजन। लेकिन इस संदर्भ में गुजरात और पूर्वोत्तर का परिणाम भी कांग्रेस को देख लेना चाहिए। गुजरात, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, सभी जगह कांग्रेस को विफलता ही मिली। कर्नाटक के अनुमान लगाया जा सकता है। यहां कांग्रेस ने लिंगायत समुदाय नहीं बल्कि भाजपा नेता येदियुरप्पा को ध्यान में रखकर विभाजन किया है। कर्नाटक में सत्रह प्रतिशत लिंगायत है, येदियुरप्पा इस समुदाय के लोकप्रिय नेता है।
    लेकिन कांग्रेस की चाल को नाटक से ज्यादा अहमियत नहीं मिल रही है। क्योकि राज्य सरकार की भूमिका इस संबन्ध में केवल प्रस्ताव पारित करने तक सीमित है। इस के क्रियान्वयन हेतु केंद्र की मंजूरी के साथ ही संविधान में संसोधन भी आवश्यक होगा। फिलहाल इसकी कोई संभवना नही है। क्योकि इस विभाजन पर संविधान संसोधन देश में अनेक विवादों को हवा देगा। देश हित को ध्यान में रखने वाली कोई भी सरकार इसी कुटिलता का कार्य नहीं करेगी जनहित में समझदारी यह है कि ऐसे किसी प्रस्ताव को प्रथमदृष्टया खारिज कर दिया जाए। लेकिन कांग्रेस की कर्नाटक सरकार ने दूषित और विभाजनकारी मानसिकता का परिचय दिया है।
    लिंगायत प्राचीन सनातन हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग है। यह सम्प्रदाय भगवान शिव को आराध्य मानता है। इस सम्प्रदाय की स्थापना बारहवीं शताब्दी में महात्मा बसवण्णां ने की थी। ‘वीरशैव’ का शाब्दिक अर्थ  शिव का परम भक्त  है। किंतु समय बीतने के साथ वीरशैव का तत्वज्ञान दर्शन, साधना, कर्मकांड, सामाजिक संघटन, आचारनियम आदि अन्य संप्रदायों से भिन्न होते गए। यद्यपि वीरशैव देश के अन्य भागों-महाराष्ट्र, आंध्र, तमिल क्षेत्र आदि – में भी पाए जाते हैं किंतु उनकी सबसे अधिक संख्या कर्नाटक में पाई जाती है। जबकि वीरशैववाद अद्वैतवाद  का दर्शन है।    प्रेमशक्ति के प्रयोग का नाम भक्तियोग, चिंतनशक्ति के प्रयोग का ज्ञानयोग तथा कर्म शक्ति के प्रयोग का नाम कर्मयोग है। इन्हीं के जरिए परमेश्वर के साथ अंतिम रूप से एकता स्थापित होती है। वीरशैवों के भी मंदिर, तीर्थस्थान अन्य संप्रदायों की तरह होते है। वीरशैवों की आस्था शिवलिंग प्रतीक में होती है। ‘ओम्‌ नम: शिवाय’ मंत्र के प्रति इनकी भक्ति होती है। भगवान शिव के प्रति समर्पण परम् साध्य माना जाता है।
    इस विवरण से स्पष्ट है कि लिंगायत या वीरशैव का आदि स्रोत भारतीय दर्शन ही है। जिसमें भगवान शिव सर्वत्र पूज्य है।
    भारतीय राष्ट्र को इन धार्मिक तत्वों ने सदैव जोड़ कर रखा है। यहां तक कि विदेशी आक्रांता भारत को राजनीतिक रूप से गुलाम बनाने में अवश्य सफल रहे थे, लेकिन विविधता के बाबजूद भारत राष्ट्र एक बना रहा।
    कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने वह कार्य किया है,जिसका साहस विदेशी आक्रांता भी नहीं कर सके। केवल कुर्सी के लिए ऐसी कुटिलता का प्रदर्शन किया गया। अब बाजी कर्नाटक के आमजन के हाँथ में है। खासतौर पर लिंगायत समुदाय के लोगों को आगे बढ़ कर इस विभाजनकारी कदम का मतदान के द्वारा जबाब देना होगा ।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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