देश में लड़कियां न मां की कोख में सुरक्षित, न जन्म लेने के बाद!

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राह चलती लड़की से छेडख़ानी। छेडख़ानी का विरोध करने पर लड़की पर तेजाब फेेंका। इकतरफा प्रेम के मामले में दिनदहाड़े लड़की की हत्या। लड़की को मनचलों ने बस से फेेंका। गुंडों का विरोध करने पर लड़की को चलती ट्रेन से फेेंका। ये खबरें भारत के किसी भी प्रदेश से, किसी भी दिन, किसी भी वक्त की मानी जा सकती हैं, क्योंकि ये खबरें कभी पुरानी नहीं पड़तीं। छेडख़ानी और अपमान के प्रसंग निरंतर घटित होते रहते हैं। कभी तीन साल की मासूम बच्ची का बस ड्रायवर यौन उत्पीडऩ करता है, कभी 70 साल की वृद्धा से बलात्कार होता है, कभी निर्भया जैसे सामूहिक बलात्कार कांड होते हैं।

इस देश में लड़कियां न मां की कोख में सुरक्षित रह गई हैं, न जन्म लेने के बाद। हर तरफ पैने दांत और नाखून लिए, लार टपकाते भेडि़ए इस तरह घूम रहे हैं कि लड़कियां न घर की चारदीवारी के भीतर महफूज हैं, न भरे बाजार में। रोजाना जिस तरह की घटनाएं सामने आती हैं, उससे लगता है कि भारत में केवल देवी प्रतिमाएं ही सुरक्षित हैं, जीती-जागती लड़कियों के लिए यह देश बेहद असुरक्षित है। शायद ही कोई दिन बीतता हो जब बलात्कार की कोई खबर न आती हो।

निर्भया कांड के बाद से बलात्कार के साथ-साथ छेडख़ानी रोकने के लिए भी कड़े कानून बनाने की बात कही गई। जगह-जगह इतने प्रदर्शन नारी के सम्मान के लिए हुए कि लगा अब सचमुच समाज बदलाव की ओर बढ़ेगा। लेकिन जैसे सड़े-गले पानी में कितना भी इत्र क्यों न डालें, दुर्गंध आती ही रहेगी, वही हाल हमारे समाज और लोगों की मानसिकता का है। एक लड़का, जो वंश को बढ़ाएगा, उसकी चाह में दो, तीन, चार लड़कियां पैदा करने से गुरेज नहीं किया जाता। लड़का पैदा करने का मकसद पूरा होता है, लेकिन उसे सभ्य इंसान बनाने की चिंता नहीं की जाती।

लड़कियों को बचपन से नसीहतों का पहाड़ा रटवाया जाता है और लड़कों को मनमानी करने के लिए छोड़ दिया जाता है। लैंगिक भेद की इस मानसिकता के कारण ही छेडख़ानी और बलात्कार जैसी घटनाएं होती हैं। लैंगिक भेद की कुल्हाड़ी समाज ने अपने पैर पर मार ही ली है, राजनीतिक दल और सत्तारूढ़ सरकारें भी इस दिशा में किसी सुधार की इच्छुक नहीं दिखती हैं।

नरेन्द्र मोदी और अरविंद केजरीवाल दोनों ने अपने चुनावों में नारी सुरक्षा को बड़ा मुद्दा बनाया और कांग्रेस को हमेशा आड़े हाथों लिया। अब इनके शासन में भी लड़कियां कितनी सुरक्षित हैं, यह सच सामने आ रहा है। दिल्ली के आनंद पर्वत इलाके में 19 साल की मीनाक्षी को दो भाइयों ने 35 बार चाकुओं का वार कर हत्या कर दी, वो लड़की लहूलुहान सरेआम मदद के लिए भागती रही, चिल्लाती रही, उसकी मां उसे बचाने आईं तो उसे भी चाकू मारा गया, ये सब तमाशा लोग देखते रहे। कोई मदद के लिए नहीं आया। भीड़ ने इतनी हिम्मत नहीं दिखाई कि चाकू मार रहे लोगों को मिलकर रोकेें या पुलिस को मदद के लिए बुलाएं। अगर इन दो लोगों के साथ भीड़ को किसी को पीटने के लिए कहा जाता तो कई मुट्ठियां तन जातीं। मीनाक्षी ने दम तोड़ दिया और केेंद्र व दिल्ली के बीच चल रही तनातनी को नई सांसें मिल गईं।

पुलिस की भूमिका पर भी नए सिरे विचार की आवश्यकता दिख रही है। देश के तमाम राज्यों में पुलिस का रवैया बेहद नकारात्मक हो गया है। शरीफ, सीधा-सादा इंसान पुलिस वालों से डरकर रहता है और गुंडे-बदमाशों का दुस्साहस बढ़ रहा है। पुलिस और कानून-व्यवस्था मजबूत हो तो शायद लड़कियां थोड़ी सुरक्षित महसूस करें।

बीड़ी सिंह

 

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