मंदिर के बहाने राजनीति में फंसे श्री श्री रविशंकर!

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‘आख़िरकार वह कौन सी वजह है जिसके कारण उन्हें इस मामले में आगे किया गया, और क्यों किया गया, अभी तक वह वर्ष 1886 से लेकर अब तक वे इस मुद्दे से विल्कुल अलग थे और इस मुद्दे पर उनका इससे पहले कोई भी वक्तव्य नहीं आया’


जी. के.चक्रवर्ती

श्री श्री रविशंकर अभी राम मंदिर अयोध्या का दौरा कर लौटे उन्होंने शुक्रवार दिनाक 17 नवंबर को लखनऊ में आये और इस्लामिक सेंटर आँफ इण्डिया गये। अयोध्या में उन्होंने वहाँ के महंतों एवं संतो से इस विषय में भी राय मशविरा किया। वहां मंदिर के आंदोलन से जुड़े नेता लोग खुश नहीं हैं। श्री श्री रविशंकर जी ने अयोध्या मसले को हल करने के लिए वहाँ का दौरा किया। वहां पर उन्होंने राम जन्म भूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष नृत्य गोपाल दास से भी वह मुलाकात की। इस 1986 से चले रहे इस मसले को हल करने के लिए संतों एवं महंतों से राय मशविरा जरूर किया। लेकिन यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आख़िरकार वह कौन सी वजह है जिसके कारण उन्हें इस मामले में आगे किया गया, और क्यों किया गया, अभी तक वह वर्ष 1886 से लेकर अब तक वे इस मुद्दे से विल्कुल अलग थे और इस मुद्दे पर उनका इससे पहले कोई भी वक्तव्य नहीं आया था लेकिन वर्त्तमान समय में अचानक उनके इस मामले में सामने आने पर ऐसा लग रहा है की उन्हें इस मुद्दे पर आगे इसलिए किया गया है क्योंकि उनके साथ कोई साम्प्रदायिक विवाद नहीं जुडे होने की वजह से किसी को उनसे कोई परहेज करने की कोई कारण तो नहीं है, नहीं साथ ही मुखतयः मुसलमानों को उनसे कोई परहेज़ नहीं होगा लेकिन अभी मौजूदा दौर में उनको लेकर मंदिर आंदोलन से जुड़े नेता बहुत खुश नहीं है वल्कि उन्हें ऐसा लग रहा है कि इस आंदोलन से जुड कर आज तक उन्होंने जो भी किया और उसका श्रेय लेना कोई दूसरा लेना चाहता हैं।

ऐसे हालातों में श्री श्री रवि शंकर की राहों में अनेको अड़चनें हैं…उनमे से सबसे पहली तो एक यही अड़चन है कि मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं का उसमे अहम् किरदार है। अब उनके अचानक सामने आने से मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं को यह लगने लगा कि वे बाहर से आकर समझौते का श्रेय स्वमं लेना चाहते हैं। इस बात पर उनका सबसे पहले विरोध तो राम जन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्य रामविलास वेदांती ने करते हुए कहा कि वे मंदिर आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए 35 बार नजर बंद हुए और 25 बार जेल भी गए, इसलिए इस बात का श्रेय उन्हें अवश्य मिलना चाहिए।

एक प्रमुख समाचार से बात करते हुए वेदांती ने कहा कि,”अयोध्या” के संतो एवं साधुओं को जब तक विश्वास में नहीं लिया जाता है, तब तक कोई भी समझौता नहीं हो सकता और नहीं इस समस्या का कोई समुचित निकलेगा। हमारे परम पूज्य अयोध्या के नृत्य गोपालदास जी महाराज , किशोरीशरण जी महाराज,अयोध्या के कन्हैया दास जी महाराज है अयोध्या के मंदिरों के महंत हैं. इन सबको सबसे पहले विश्वास में लिया जाना चाहिए।”

वर्ष 1984 से प्रारंभ हुए इस मंदिर आंदोलन ने बहुत सारे लोगों को एक बड़े नेता की पदवी पर पंहुचा देने के साथ ही साथ उनको बड़ी हैसियत वाला व्यक्ति भी बना डाला। श्री श्री रविशंकर अब तक मंदिर आंदोलन का हिस्सा जरूर नहीं रहे हैं लेकिन देश में उनका नाम बहुत बड़े होने से वर्त्तमान में मंदिर आंदोलन कर्ता नेताओं को ऐसा अवश्य लग रहा है कि श्री श्री के आ जाने से उन लोगों की हैसियत बहुत छोटी न हो जाए। दूसरी तरफ विहिप ने कहा कि राम जन्मभूमि के लिए सभी प्रणाम हिंदुओं के पक्ष में, फिर समझौते की क्या आवश्यकता है?

प्रारम्भ से ही दिगंबर अखाड़े के महंत श्री रामचंद्र जी परमहंस मरते दम तक मंदिर के लिए लड़ते रहे हैं उनके उत्तराधिकारी श्री महंत सुरेश दास श्री श्री के अयोध्या आने की बात से वे खुश नहीं दिखते है उन्होंने एक प्रमुख समाचार पत्र से एक साक्षात्कार में कह कि रविशंकर जी आएंगे तो अयोध्या में उनका स्वागत है लेकिन बाकी के निर्णय हम अयोध्यावासी लोग ही करेंगे।

भारतीय जनता पार्टी के एक नेता विनय कटियार जी शुरू से ही पार्टी में स्वमं को उपेक्षित महसूस करते रहने कारण उन्होंने कहा कि मोदी एवं योगी दोनों से प्रश्न नहीं होने से मुखमंत्री अयोध्या में हुई रैली में शामिल नहीं हुए जबकि वे शुरू से ही मंदिर आंदोलन से जुड़े रहने के कारण श्री श्री रविशंकर से मिलने तो अयोधया जरूर पहुंचे, लेकिन वे उनकी प्रयासों से संतुष्ट नहीं दिखे। अयोधया में विवादित भूमि के दावे को लेकर ही महंतों एवं संतो में ही कई गुट हैं अब इन गुटों की आपसी टकराव सामने आने से उससे निपटना भी श्री श्री के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होगी।

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