टेंडर में 8,500 करोड़ का खेल: CBI जांच की मांग, निजी कंपनियों को रियायत, उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ
लखनऊ, 17 अक्टूबर 2025: उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटरों की स्थापना को लेकर विवाद ने तूल पकड़ लिया है। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार की अनुमोदित 18,885 करोड़ रुपये की योजना को 27,342 करोड़ रुपये में बढ़ाकर निजी कंपनियों को टेंडर दे दिए गए, जिससे 8,500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त लागत उपभोक्ताओं पर लाद दी जा रही है। परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने दावा किया कि बिना विद्युत नियामक आयोग (UPERC) की मंजूरी के सिंगल फेज मीटर के लिए 6,016 रुपये और थ्री फेज के लिए 11,342 रुपये वसूले जा रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ये कीमतें क्रमशः 2,610 और 4,050 रुपये हैं।
यह विवाद तब और गहरा गया जब UPPCL ने नए कनेक्शनों के लिए स्मार्ट मीटरों को अनिवार्य कर दिया। 10 सितंबर के एक आदेश के बाद, 1.74 लाख नए आवेदनों में से 37,000 से अधिक लंबित हैं, क्योंकि लागत में छह गुना तक की बढ़ोतरी हो गई है। UPPCL के चेयरमैन अशीष गोयल का कहना है कि वास्तविक लागत 8,000 रुपये प्रति मीटर है, लेकिन परिषद इसे पुरानी 2019 की कॉस्ट डेटा बुक पर आधारित बताते हुए चुनौती दे रही है। एक 2023 के टेंडर में मध्यांचल विद्युत विपणन निगम ने इन्हें 3,510 रुपये प्रति यूनिट में खरीदा था, जो वर्तमान दरों से काफी कम है।
परिषद ने निजी कंपनियों को 10% की बजाय 3% परफॉर्मेंस बैंक गारंटी देने की मंजूरी को भी अनियमित बताया। अगस्त 2023 में UPPCL के बोर्ड ने कंपनियों की “खराब आर्थिक स्थिति” का हवाला देकर यह छूट दी, लेकिन उपभोक्ताओं को कोई राहत नहीं मिली। इसके अलावा, मीटरों में तकनीकी खामियां सामने आई हैं जैसे पावर फैक्टर गलत रिकॉर्डिंग, RTC ड्रिफ्ट और गलत मल्टीप्लाइंग फैक्टर, जिन्हें ठीक करने के लिए UPPCL ने ठेकेदारों को नोटिस जारी किया है। पिछले साल 40 लाख मीटरों की कमियों को दूर करने का आदेश दिया गया था, लेकिन प्रगति धीमी है।
राष्ट्रीय स्तर पर स्मार्ट मीटरिंग RDSS योजना के तहत 25 करोड़ मीटर लगाने का लक्ष्य 2025 तक है, लेकिन केवल 5% ही स्थापित हो पाए हैं। उत्तर प्रदेश में 2.73 करोड़ मीटर लगाने की योजना है, लेकिन उपभोक्ता परिषद का तर्क है कि प्रीपेड मीटरों को थोपना बिजली अधिनियम 2003 की धारा 47(5) का उल्लंघन है, जो पोस्टपेड का विकल्प देता है। ऊर्जा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि मीटर बदलने का खर्च उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता, फिर भी यूपी में ऐसा हो रहा है। महाराष्ट्र में MSEDCL ने 2.5 करोड़ मीटरों के लिए 26,921 करोड़ का टेंडर जारी किया, लेकिन वहां भी लागत वसूली पर सवाल उठे हैं ?हालांकि यूपी से सस्ते दामों पर।
सोशल मीडिया और सड़कों पर विरोध बढ़ रहा है। बिहार, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी मीटरों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं, जहां बिजली कटौती और अधिक बिलिंग की शिकायतें आम हैं।
उपभोक्ता परिषद ने मांग की है: वसूली तुरंत बंद हो, 8,500 करोड़ की अतिरिक्त लागत की जांच हो, पहले वसूली गई राशि लौटाई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो। उन्होंने CBI जांच की मांग भी की है, ताकि टेंडर प्रक्रिया और निजी कंपनियों को मिली रियायतों का पर्दाफाश हो।
फ़िलहाल UPPCL ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी। यह विवाद न केवल बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर असर डाल रहा है, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहा है। क्या यह घोटाला साबित होगा, या योजना को सुधारकर आगे बढ़ाया जाएगा अगले कुछ हफ्तों में साफ हो सकता है।







