संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के साथ ही राज्यसभा में 12 सदस्यों के निलंबन और उस पर विपक्ष की प्रतिक्रिया से हंगामे की स्थिति बन गई है। सदन के सभापति वेंकैया नायडू ने सांसदों के आचरण को गलत ठहराते हुए निलंबन वापस लेने से इंकार कर दिया है।
मंगलवार को दिन भर हंगामे के कारण कार्यवाही नहीं चल सकी। ऐसे में यह सवाल उठ खड़ा होता है कि जो संसद देश चलाने के लिए नियम-कायदे बनाने की जगह है, वह लगातार बाधित क्यों चल रही है।
ध्यान रहे कि राज्यसभा ने एक नोटिस के माध्यम से सूचित किया कि मानसून सत्र के आखिरी दिन कई दलों से 12 सांसदों ने न केवल हंगामा किया बल्कि सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ जानबूझ कर हिंसा करने की कोशिश की। इसके बाद इस सत्र में संबंधित सांसदों के खिलाफ यह कार्रवाई की गई। वैसे तो अलग-अलग वजहों से सांसदों के निलंबन के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं लेकिन इस बार की कार्रवाई को भिन्न रूप में इसलिए देखा जा रहा है कि इन सबके खिलाफ पिछले यानी मानसूत्र सत्र के दौरान अनुशासन भंग करने के लिए यह कार्रवाई की गई।
ऐसे में सहज ही प्रश्न उठता है कि पिछले सत्र में हए हंगामे के बाद और इतनी अवधि बीत जाने पर इस तरह की स्थितियों से बचने के लिए कोई हल निकालने के लिए सरकार और विपक्षी दलों के बीच क्या कोई संवाद हुआ ताकि भविष्य में ऐसे हालात न पैदा हों। अब राज्यसभा में हुई कार्रवाई के बाद स्वाभाविक ही विपक्षी दलों के बीच क्षोभ पैदा हुआ है और वे सांसदों का निलंबन वापस लेने की मांग कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने पूरे सत्र के बहिष्कार की बात भी की है।
अगर सरकार भी अपनी जिद पर अड़ी रहती है और सदन के बाधित रहने या एकपक्षीय तरीके से चलने के हालात बनते हैं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि संसद के कामकाज में लोकतंत्र कितना बचा रहेगा। सच तो यह है कि पिछले कुछ समय से सदनों का कामकाज जिस तरह से बाधित हो रहा है, उसका दूरगामी असर भी देखने को मिल सकता है।







