अमिताभ श्रीवास्तव
अजीब इत्तिफ़ाक़ है कि बीते इतवार की दोपहर हम कुछ लोग सिनेमा पर बात करते हुए पारिवारिक फ़िल्मों की संख्या में आती कमी पर चर्चा के दौरान समाज में बुज़ुर्गों की हालत की तरफ़ मुड़े थे और उस बातचीत के क्रम में अचानक मेैंने जसदेव सिंह से हुई मुलाक़ातों, उनकी उदासियों का ज़िक्र किया था। 2010 में दिल्ली में हुए काॅमनवेल्थ खेलों पर विशेष आयोजन के सिलसिले में हमने अपने चैनल के लिए जिन खेल विशेषज्ञों को अनुबंधित किया था, जसदेव सिंह और नरोत्तम पुरी भी उनमें थे। रेडियो कमेंट्री के दौर से लेकर टीवी कमेंट्री तक में झंडे गाड़ चुके इन दोनों महारथियों से रूबरू मिलना और उनसे बात करना एक सपने के सच होने जैसा था। नरोत्तम पुरी जहाँ एक बहुत शालीन प्रोफ़ेशनल थे।
वहीं जसदेव जी में काम पर फ़ोकस के साथ साथ कैमरे से इतर बातचीत में बहुत आत्मीयता भी रहती थी। जसदेव जी उन दिनों दिल्ली-जयपुर की आवाजाही करते थे । बतरस के शौक़ीन थे। वीडियोकाॅन टावर के सातवें फ़्लोर पर वह हमारे पास समय से थोड़ा पहले ही आकर बैठ जाते थे और फिर हमारे लिए अपनी गुज़री हुई ज़िंदगी की किताब के पन्ने पलटते रहते थे। कैसे महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा की कमेंट्री करते मेल्विल डिमैलो को सुना, कमेंट्री का चस्का लगा, फिर 26 जनवरी की परेड, नेहरू की अंतिम यात्रा से लेकर एशियाड 82 तक के क़िस्से सुनाते रहते थे। हमारे लिए वह सब किसी ख़ज़ाने से कम नहीं था।
जसदेव सिंह जी पद्म भूषण से सम्मानित थे, ओलंपिक खेलों में कमेंट्री के लिए भी विशेष तौर पर सम्मानित किये गये थे मगर सरकारी स्तर पर उपेक्षा का दर्द बातचीत के बीच में अक्सर उभर आता था। अपने स्वास्थ्य, बढ़ती उम्र, अकेलेपन वग़ैरह को लेकर चिंताएँ भी साझा करते थे। बातों बातों में उन्होंने यह इच्छा जताई कि वह अपनी आत्मकथा ‘मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूँ’ पर आधारित टीवी शो करना चाहते हैं लेकिन उन्हें यह भी मालूम था कि न्यूज़ चैनल पर क्रिकेट के अलावा खेल में कुछ चलता नहीं । जब पूछा कि कामनवेल्थ खेलों में कमेंट्री क्यों नहीं कर रहे, तो अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट के साथ ग़ालिब का मशहूर शेर कहा –
बाज़ीचा ए अत्फाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे







