Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Tuesday, April 28
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»धर्म»Spirituality

    तनाव प्रबंधन की कारगर कुंजी श्रीमद्भगवदगीता

    By November 30, 2017 Spirituality No Comments12 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 675

    गीता जयंती पर विशेष

    पूनम नेगी

    अपनी तर्कपूर्ण शिक्षाओं और प्रकाशपूर्ण प्रेरणाओं के कारण श्रीमद् भगवदगीता को वैश्विक ग्रंथ की मान्यता हासिल है। वर्तमान की तनावपूर्ण परिस्थितियों में गीता स्ट्रैस मैनेजमेंट की अत्यन्त कारगर कुंजी साबित हो रही है। देश-विदेश के नामचीन मैनेजमेंट गुरु भगवदगीता के प्रबंधन सूत्रों का लाभ उठा कर उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं। गीता के प्रबंधन सूत्रों को अपने प्रतिष्ठानों में लागू करने वाली देशभर की नामी-गिरामी कम्पनियां इनके नतीजों से काफी उत्साहित व प्रसन्न हैं। एचआर( ह्यूमन रीर्सोसेज) प्रबंधकों की मानें तो भागमभाग और गलाकाट प्रतिस्पधा के वर्तमान दौर में इस ग्रन्थ को मानव जीवन की सर्वोत्कृष्ट आचार संहिता कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

    गीता में प्रतिपादित प्रबंधन सूत्रों का अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति सहज ही अपनी उन्नति और विकास कर सकता है। गीता कहती है, “योग: कर्मसु कौशलम्।” यानी कार्यफल में समता रूपी निपुणता प्राप्त कर लेना। किसी कार्य में समग्र रूप से निमग्न हो जाना ही योग है। कार्य के संग अनासक्त भाव ही निष्काम कर्म है। आसक्ति ही कर्म का बंधन बनती है। हमारे प्रत्येक कर्म के पीछे निहित उद्देश्य ही कर्मफल के रूप में हमारे सामने आता है और हमें उस भोग को भोगना ही पड़ता है। मगर गीता के सूत्रों पर पूरी निष्ठा से अमल करने से लक्ष्यसिद्धि सहज ही की सकती है। गीता के इन्हीं दिव्य सूत्रों के नतीजों से उत्साहित होकर आज पूरी दुनिया में गीता का प्रशासकीय प्रबंधन के ज्ञान भंडार के रूप में अध्ययन-मनन किया जा रहा है। इसमें वर्णित व्यावहारिक ज्ञान न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी कुशल प्रबंधन का अचूक मंत्र साबित हो रहा है।

    बढ़ा मल्टीनेशनल कम्पनियों का मुनाफा

    आज देश-विदेश की कई मल्टीनेशनल कम्पनियां श्रीमद्भगवतगीता के श्लोकों का इस्तेमाल कर्मचारियों में नई ऊर्जा का संचार करने के लिए कर रही हैं। कर्मचारियों को गीता का ज्ञान देने के लिए बाकायदा मोटिवेशनल ओरेटर-लेक्चरर और धर्मगुरुओं को आमंत्रित किया जा रहा है। सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल ओरेटर विवेक बिंद्रा के मुताबिक सर्वेक्षण में पाया गया है कि आज विभिन्न कम्पनियों में काम करने वाले 80 फीसद से अधिक कर्मचारी अपनी दक्षता के अनुरूप काम नहीं कर पाते, सिर्फ दस फीसद कर्मचारी ही कम्पनी को आगे ले जाने के लिए अपना पूरा योगदान देते हैं। ऐसे में नकारात्मक कार्यस्थितियों तथा कर्मचारियों की काम के प्रति अरुचि जैसे कारणों से ज्यादातर कम्पनियों की उत्पादकता घट जाती है। इन समस्याओं का समाधान गीता के बहुत सुंदर सूत्रों में दिया गया है। जिस तरह गीता के पहले अध्याय में भगवान श्री कृष्ण शांत भाव से अर्जुन की सारी बात सुनते हैं, उसी तरह कम्पनी के वरिष्ठों को भी अपने अधीन कर्मचारियों की बात पूरी गहराई से सुननी व समझनी चाहिए। ऐसे ही दूसरे अध्याय के श्लोक “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…” निष्काम कर्म का उपदेश देता है तथा छठा अध्याय तनाव कम करने का। जैसी मनुष्य की मन:स्थिति होती है, उसी के अनुरूप वह काम करता है। यह फॉर्मूला घर-बाहर, हर जगह लागू होता है। यदि कंपनी नुकसान झेल रही है तो गीता में इसका सरल उपाय है- पहले आचार फिर विचार एवं अंत में प्रचार।

    विभिन्न कंपनियों ने गीता के इन्हीं प्रबंधन सूत्रों को लागू कर अपने कर्मचारियों की कार्यक्षमता व कौशल बढ़ाने में आशातीत सफलता पाई है। मारुति सुजुकी इंडिया के प्रोजेक्ट निदेशक एल.के. गुप्ता का कहना है कि गीता के प्रबंधन सूत्रों का कंपनी के सभी कर्मचारियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। उनमें ना केवल नई ऊर्जा का संचार हुआ बल्कि हमारा सक्सेस रेट भी 80 फीसद के ऊपर पहुंच गया। “रिलैक्सो” के मैनेजिंग डॉयरेक्टर आर.के.दुआ भी कहते हैं कि उनके कर्मचारियों की दक्षता बढ़ाने में गीता के सूत्र बहुत मददगार साबित हुए हैं। “एसोटैक रिएलटी” के मैनेजिंग डायरेक्टर नीरज गुलाटी का भी कहना है कि गीता के सूत्रों पर अमल से उनकी कंपनी के कर्मचारियों की कार्यदक्षता में 60 से 70 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। ब्योम नेटवर्क के चीफ मैनेजर उमंग दास और रोटरी इंटरनेशनल के सुधीर मंगला की मानें तो गीता की शिक्षाओं ने उनकी कंपनी के कर्मचारियों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया है।

    विश्वविद्यालय, प्रबंधन व स्कूल पाठ्यक्रम में गीता

    प्राचीन भारतीय संस्कृति व जीवन मूल्यों में आस्था रखने वाले हरेक उस भारतवासी के लिए वाकई यह गौरव का विषय है कि महाभारत की युद्ध भूमि में गीता नायक श्रीकृष्ण द्वारा युद्ध से पलायन को तत्पर अर्जुन को जो ज्ञान दिया था, उसे आज दुनियाभर के कई उच्च शिक्षण-प्रबंधन संस्थान और स्कूल अपने पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना रहे हैं। अमेरिका, जर्मनी व नीदरलैंड जैसे कई विकसित देशों ने अपने देश के शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल कर रखा है। अमेरिका के न्यूजर्सी स्थित सैटानहॉल विश्वविद्यालय में तो हरेक छात्र को गीता का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ना अनिवार्य है।

    वस्तुत: गीता सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान नहीं बल्कि समग्र जीवन दर्शन है जो समूची विश्व वसुधा को “सर्वे भवन्तु सुखिन:” का पाठ पढ़ाता है। इसलिए गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करना समय की मांग है। इसके पाठ्यक्रम में शामिल होने से नई पीढ़ी को न सिर्फ जीवन मूल्यों की शिक्षा मिलेगी वरन उनके व्यक्तित्व का भी संतुलित विकास होगा। यही वजह है कि देश के सभी विश्वविद्यालयों में योग के साथ यूजीसी की ओर से तैयार पाठ्यक्रम में गीता को सम्मिलित किया गया है। इस बाबत एक दिलचस्प जानकारी यह है कि उत्तराखण्ड में मूल्यपरक उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अनेक कीर्तिमान स्थापित करने वाले देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति व जाने माने आध्यात्मिक चिंतक डा. प्रणव पण्ड्या तो सप्ताह में दो बार स्वयं गीता की कक्षाएं लेते हैं। इन कक्षाओं में सभी विषयों के विद्यार्थी व सभी शिक्षक और कर्मचारी अनिवार्य रूप से शामिल होते हैं। खास बात यह है कि इन कक्षाओं में विदेशी विद्यार्थी भी पूरी रुचि व श्रद्धा से शिरकत करते हैं।

    राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा व गुजरात आदि कुछ राज्यों ने भी गीता के सूत्रों के बहुआयामी लाभों को समझकर अपने राज्य के शैक्षिक पाठ्यक्रम में गीता के साथ ही रामायण के प्रबंधन सूत्रों को शामिल कर सराहनीय कार्य किया है। भारत की सबसे धनी मुम्बई नगरपालिका ने भी अपने विद्यालयों में गीता की पढ़ाई शुरु  कर एक प्रशंसनीय कदम उठाया है। मगर इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि वोटों की राजनीति के चलते देश के कई राज्यों में यह स्थिति अब तक नहीं बन पायी है। शिक्षा के भगवाकरण का आरोप लगाने वाले संकुचित मानसिकता वाले लोग केन्द्र सरकार के इस कदम लाख का विरोध करें, मगर देश का बुद्धिजीवी वर्ग इस पहल का खुलेदिल से स्वागत कर रहा है। बताते चलें कि हरियाणा व मध्यप्रदेश सरकार के मुताबिक स्कूली पुस्तकों को समावेशी बनाने की दृष्टि से पाठ्यक्रम में गीता के कुछ अंशों के साथ ही विभिन्न धर्म-संप्रदायों के विषय भी विद्यार्थियों केज्ञानवर्धन के लिए शामिल किये गये हैं। इनमें पैगम्बर हजरत मोहम्मद की जीवनी, वाकया-ए-कर्बला और गुरु नानक देव, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, जीजस क्राइस्ट का जीवन दर्शन व शिक्षाएं भी शामिल हैं। बात साफ है। इनमें से कोई भी पाठ अपनी प्रकृति में धार्मिक या साम्प्रदायिक नहीं है। इनसे न किसी का न धर्म बिगड़ता है, न किसी धर्म का प्रचार होता है। दूसरी बात, इसे अनिवार्य बनाने की किसी मंशा का आरोप भी इसी बात पर खत्म हो जाता है कि जिन कक्षाओं की उर्दू पाठ्य-पुस्तकों में इन पाठों को शामिल किया गया है, उनमें परीक्षा में आधार पर कक्षा में रोकने का भी प्रावधान नहीं है। फिर भी यदि किसी छात्र-छात्रा को इन पाठों के पढ़ने में रुचि न हो तो वे इन पाठों को वैकल्पिक विषय मान सकते हैं।

    उल्लेखनीय है कि जनवरी 2012 में जब मध्यप्रदेश के स्कूलों में गीता-सार पढ़ाए जाने के शासन के निर्णय के विरुद्ध जब कैथोलिक बिशप कौंसिल द्वारा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गयी थी तो तथ्यों का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने यह व्यवस्था दी थी कि गीता मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है न कि भारत के हिन्दू धर्म की। इस दृष्टि से गीता के व्यवहारिक जीवन में उपयोगी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इससे जुड़े जो पाठ स्कूल की नैतिक शिक्षा की पुस्तकों में शामिल किये गये हैं, उन्हें धार्मिक या साम्प्रदायिक नजरिए से देखना गलत है। बताते चलें कि मध्यप्रदेश में वर्ष 2011-12 से गीता के व्यवहारिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित विभिन्न पाठ्य सामग्री, कक्षा 1 से 12 की भाषा की पुस्तकों में समाहित है। ये पुस्तकें शासकीय पाठशालाओं के साथ ही अनुदान प्राप्त मदरसों में भी चल रही हैं और इस सम्बंध में अभी तक किसी प्रकार की कोई आपत्ति सामने नहीं आयी है।

    डा. होमी जहांगीर भाभा ने की थी “गीता” को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करने की मांग

    देश में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक डा. होमी जहांगीर भाभा का कहना था कि वैज्ञानिकों को ऐसा रास्ता चुनना चाहिए जिसमें वैज्ञानिक कर्मों के साथ आध्यात्मिकता की पावन संवेदना भी निहित हो। उनकी प्रिय पुस्तक थी श्रीमद्भगवदगीता और उनकी प्रेरणा का मूलस्रोत था महाभारत की युद्धभूमि का वह चित्र जिसमें योद्धावेश में सुसज्जित भगवान श्रीकृष्ण विषादग्रस्त अर्जुन को गीता का ज्ञान दे रहे हैं। उंगली में प्रज्वलित चक्र है, तनी हुईं त्योरियां मगर ओठों पर शांत मुस्कान। भीत अर्जुन उनके पांवों को पकड़े हैं। उनका कहना था कि यह चित्र हमारे परमाणु ऊर्जा सम्पन्न समर्थ व विकसित राष्ट्र का है। गांधी जी भले ही हमारे राष्ट्रपिता हैं मगर मेरी दृष्टि में श्रीकृष्ण हमारे राष्ट्र के आदि पिता हैं। उनके हाथों में प्रज्वलित सुदर्शन चक्र ऐसा लगता है मानो उन्होंने इस चक्र के रूप में प्रचंड परमाणु ऊर्जा को धारण कर रखा हो। उनकी तनी हुई त्योरियां आक्रांता शत्रुओं के लिए साहसिक प्रत्युत्तर हैं जिसे देख शत्रु भयभीत एवं आतंकित हैं। साथ ही उनके ओंठो की मुस्कान इस सत्य का आश्वासन है कि हम शांति के पक्षधर हैं और अर्जुन के रूप में वे देश की कायरता और क्लीवता को अपने पांवों की ठोकर से प्रचंड पौरुष एवं महापराक्रम में रूपांतरित कर रहे हैं। श्रीकृष्ण मुझे इसलिए प्रेरित करते हैं क्योंकि वे विश्व के महानतम अध्यात्मवेत्ता व दार्शनिक होने के बावजूद महाशस्र “प्रज्वलित चक्र” थामे हैं जो उनके सतत कर्मशील होने का परिचायक है।

    जरा विचार कीजिए! गीता के प्रणेता के इस चित्र की कितनी अद्भुत व्याख्या की है डा. भाभा ने। वे “श्रीमद्भगवदगीता” की अमूल्य शिक्षाओं की अहमियत को भलीभांति जानते थे। संभवत: इसीलिए उन्होंने आजादी के कुछ ही समय बाद गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित करने की मांग की थी। वे सही मायने में गीता के निस्पृह कर्मयोगी थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्री ने जब उन्हें केबिनेट मंत्री पद देने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने अति विनम्रता से भगवान श्रीकृष्ण की वाणी का स्मरण कराया-

    श्रेयान्स्वधमा विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

    स्वधम निधनं श्रेय: परधर्मा भयावह:।।

    अर्थात स्वयं के कर्त्तव्य का पालन कमतर होते हुए भी दूसरे के कर्त्तव्य से श्रेष्ठ है। अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए मरना भी कल्याणकारक है, लेकिन दूसरे का कर्त्तव्य तो भय देने वाला है।”

    उनकी इस आध्यात्मिक नि:स्पृहता के सामने शास्त्री जी जैसे त्यागमूर्ति भी नतमस्तक हुए बिना न रह सके थे। अपनी मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व डा. भाभा ने अपने सहयोगियों से कहा था कि देश के लोग जिस दिन वैज्ञानिक अध्यात्म के महत्व को पहचान लेंगे, उस दिन से अपना राष्ट्र पुन: विश्वगुरु बन जाएगा।

    गीता के प्रबंधन सूत्र

    श्रीमद्भगवदगीता हिंदू धर्म का पवित्रतम ग्रंथ माना जाता है। इसके माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को धर्मानुसार कर्म करने की प्रेरणा दी है। इसकी शिक्षाएं किसी काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नहीं अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिए उपयोगी हैं। उपादेयता की दृष्टि से इन सर्वकालिक सूत्रों पर गहराई से विचार करने प्रतीत होता है कि मानो ये उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने आज की परिस्थितियों (कलयुग) को ध्यान में रखते हुए ही दिए हैं। यही कारण है कि आईआईएम से लेकर दूसरे मैनेजमेंट स्कूलों तक सभी में गीता को प्रबंधन की किताब के रूप में स्वीकार किया गया है। गीता दुनिया की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर इंसान के सामने आती है। आइए जानते हैं गीता के इन महत्वपूर्ण प्रबंधन सूत्रों को-

    1. श्लोक- त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

    कामः क्रोधस्तथा लोभस्तरमादेतत्त्रयं त्यजेत।।

    अर्थ- काम, क्रोध व लोभ। यह तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

    प्रबंधन सूत्र- काम यानी इच्छाएं, गुस्सा व लालच ही सभी बुराइयों का मूल कारण है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हें नरक का द्वार कहा है। जिस भी मनुष्य में ये तीन अवगुण होते हैं वह हमेशा दूसरों को दुख पहुंचाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगे रहते हैं। अगर हमें अपने लक्ष्य को पाना है तो इन तीन अवगुणों को हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए।

    1. श्लोक- तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः

    वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।

    अर्थ- श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- मनुष्यों को चाहिए कि वह संपूर्ण इंद्रियों को अपने वश में रखे और विवेकानुसार कार्य करे। जिस पुरुष की इंद्रियां उसके वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है।

    प्रबंधन सूत्र- आंखें, कान, नाक, जीभ व त्वचा; मनुष्य अपनी इन पांच इंद्रियों माध्यम से सांसारिक सुखों का आनन्द लेता है। जो मनुष्य अपनी इन इंद्रियों पर काबू रख लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति अपने कर्तव्यों का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करता है और कार्यक्षेत्र में ऊंचाइयों को छूता है।

    1. श्लोक- योगस्थ: कुरुकर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।

    सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

    अर्थ- कृष्ण कहते हैं, हे धनंजय (अर्जुन)! कर्म न करने का मन त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर कर्म कर। समत्व को ही योग कहते हैं।

    प्रबंधन सूत्र- धर्म का अर्थ है कर्तव्य। धर्म के नाम पर आज हम सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित हैं। श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। अगर ऐसा होगा तो हम अपना पूरा ध्यान अपने लक्ष्य की तरफ नहीं लगा सकेंगे। इसलिए बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिककर ही काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति भी रहेगी।

    1. श्लोक- विहाय कामान्य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।

    निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।

    अर्थ- जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, केवल उसे ही शांति प्राप्त होती है।

    प्रबंधन सूत्र- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखने वाले मनुष्य को कभी भी शांति प्राप्त नहीं हो सकती। शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कार्य करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। हमें अपने मन से अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

    Keep Reading

    Relationships are nature's gifts

    रिश्ते उपहार हैं प्रकृति का, सब धर्मों में रिश्ते और उनके कर्तव्यों को रखा गया है सर्वोपरि

    दुःख आता है, लेकिन रुकना जरूरी नहीं

    The 'Big Bull's' Final Lesson: To truly understand life, one must visit three specific places?

    बिग बुल की अंतिम सीख : जीवन को सही से समझना हो तो तीन जगह जाना चाहिए ?

    Silence in the Face of Provocation Is the True Victory: Osho's Profound Message

    उकसावे पर चुप्पी ही असली जीत: ओशो का गहरा संदेश

    The Relevance of Lord Hanuman and His Character in the Contemporary Scenario

    वर्तमान परिदृश्य में हनुमान जी और उनके चरित की प्रासंगिकता

    गौतम बुद्ध की तीन अमर शिक्षाएं जो आपकी जिंदगी बदल सकती हैं

    Add A Comment
    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts
    June-like Scorching Heat Grips UP in April Itself; Mercury Soars Past 47°C as Hospitals Swarm with Heatstroke Patients

    यूपी में अप्रैल में ही जून जैसी भीषण गर्मी, पारा 47°C के पार; अस्पतालों में हीट स्ट्रोक मरीजों की भीड़

    April 28, 2026
    Trump's Bold Claim, Iran's Sharp Response: Strait of Hormuz Closed Again; Firm Denial on Uranium

    अमेरिकी नाकाबंदी से ईरान पर दबाव बढ़ा, लेकिन रूस का समर्थन: ‘ईरान को सैन्य धमकियों से नहीं डराया जा सकता’

    April 28, 2026
    Parents have been subjected to such manipulation for a very long time—it is simply that awareness has increased now.

    खेल तो पेरेंट्स के साथ बहुत पहले से होता आया है -जागरूकता अब बढ़ी

    April 28, 2026
    Twists at Every Turn: Murder Mystery ‘M4M’ Keeps Audiences Guessing

    ₹1 लाख की अनोखी चुनौती! मर्डर मिस्ट्री फिल्म ‘M4M’ में ट्विस्ट पर ट्विस्ट

    April 28, 2026
    Brother Digs Up Sister's Grave, Carries Skeleton on His Shoulder to Bank—Just to Withdraw ₹19,300!

    बहन की कब्र खोदकर कंकाल कंधे पर लादकर बैंक पहुंचा भाई! सिर्फ ₹19,300 निकालने के लिए

    April 28, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading