दरभंगा राज की अंतिम महारानी कमसुंदरी देवी का निधन: मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर की साक्षी रहीं महारानी – सादगी, त्याग और सेवा की मिसाल, अब इतिहास की किताबों में दर्ज हो गईं उनकी कहानी
नई दिल्ली। बिहार के ऐतिहासिक दरभंगा राजघराने की अंतिम कड़ी, महारानी कामसुंदरी देवी ने 12 जनवरी 2026 को कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। 94 वर्ष की उम्र में उनकी विदाई ने मिथिलांचल में गहरा शोक छा दिया है। महारानी काफी समय से अस्वस्थ चल रही थीं और सोमवार तड़के उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
RIP : 22 OCT 1932 – !2 JAN 2026
महारानी कामसुंदरी देवी स्वर्गीय महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी थीं। उनका जन्म 22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव में हुआ था। मात्र 8 वर्ष की छोटी उम्र में उनकी शादी हो गई थी, और महाराज के 1962 में निधन के बाद उन्होंने 64 वर्ष तक विधवा जीवन व्यतीत किया। इस दौरान उन्होंने राजसी वैभव को त्यागकर सादगीपूर्ण जीवन अपनाया और मिथिला की सांस्कृतिक, शैक्षिक व सामाजिक विरासत को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

राष्ट्र के संकट में खोला खजाना – 1962 भारत-चीन युद्ध की यादगार मिसाल
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान जब देश को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा था, तब दरभंगा राज परिवार ने सरकार की अपील पर दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में करीब 15 मन (लगभग 600 किलोग्राम) सोना तौलकर राष्ट्र रक्षा कोष में दान कर दिया। यह योगदान भारतीय इतिहास में किसी निजी परिवार द्वारा किया गया सबसे बड़ा दान माना जाता है। इसके अलावा परिवार ने तीन निजी विमान सेना को सौंपे और 90 एकड़ जमीन देकर दरभंगा एयरपोर्ट के निर्माण में सहयोग किया। महारानी ने इस पूरे अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाई, जो आज भी राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा बनी हुई है।
विरासत और योगदान
दरभंगा राज ने सदियों से शिक्षा, संस्कृति और लोककल्याण में अहम भूमिका निभाई। महाराज कामेश्वर सिंह के निधन के बाद महारानी ने उनकी स्मृति में कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की, जिसके माध्यम से सामाजिक कार्य जारी रहे। परिवार ने कई विश्वविद्यालयों (जैसे पटना यूनिवर्सिटी, BHU आदि), मेडिकल कॉलेज, सड़कें, चीनी मिलें और अन्य उद्योगों की स्थापना में योगदान दिया। महारानी ने राजपरंपरा की मर्यादाओं का पालन करते हुए लोकजीवन से जुड़ी रहीं और कभी सत्ता का प्रदर्शन नहीं किया।
उनके निधन के साथ दरभंगा राज का एक जीवंत अध्याय समाप्त हो गया। अंतिम संस्कार माधेश्वर प्रांगण में हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुआ, जहां परिवार के सदस्यों और मिथिला के हजारों लोगों ने श्रद्धांजलि दी। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर उन्हें ‘मिथिला की मां’ कहकर याद किया जा रहा है।
महारानी कामसुंदरी देवी की स्मृति हमें सिखाती है कि सच्ची महानता वैभव में नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और देशभक्ति में होती है। उनका जाना न सिर्फ एक परिवार का, बल्कि मिथिला की गौरवशाली परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खोना है।






