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    चुनाव आयोग की मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने कह दी बड़ी बात

    ShagunBy ShagunJuly 10, 2025Updated:July 10, 2025 Current Issues No Comments8 Mins Read
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    Post Views: 1,044

    विश्लेषण: उपेंद्र राय 

    भारत का लोकतंत्र अपनी जीवंतता और समावेशिता के लिए विश्व भर में जाना जाता है, और इसके मूल में है मतदाता का अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत प्रत्येक 18 वर्ष से अधिक आयु के भारतीय नागरिक को सुनिश्चित किया गया है। हालांकि, हाल ही में बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर उठा विवाद और सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां इस बात की ओर इशारा करती हैं कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्धता और संवैधानिकता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह विश्लेषण बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण, चुनाव आयोग की भूमिका, सुप्रीम कोर्ट की फटकार, और इसके व्यापक प्रभावों पर प्रकाश डालता है।

    चुनाव आयोग की प्रक्रिया और विवाद का मूल

    चुनाव आयोग ने 24 जून, 2025 को बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का आदेश दिया, जिसका उद्देश्य डुप्लिकेट नाम, मृत व्यक्तियों के नाम, और अपात्र व्यक्तियों को हटाकर सूची को शुद्ध करना बताया गया। इस प्रक्रिया में मतदाताओं से अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 11 दस्तावेजों में से एक जमा करने की मांग की गई, जिसमें जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, और अन्य दस्तावेज शामिल हैं, लेकिन आधार कार्ड, राशन कार्ड, और मतदाता पहचान पत्र को इस सूची से बाहर रखा गया। यह निर्णय कई कारणों से विवादास्पद बन गया।

    पहला, इस प्रक्रिया का समय: बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और इस समय मतदाता सूची में संशोधन शुरू करना, खासकर जब यह नागरिकता सत्यापन से जुड़ा हो, संदेह पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सवाल उठाया कि “इसे पहले क्यों नहीं किया गया? चुनाव से ठीक पहले यह प्रक्रिया क्यों शुरू की जा रही है?”

    दूसरा, दस्तावेजों की मांग: चुनाव आयोग ने आधार कार्ड को नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जबकि आधार देश की सबसे व्यापक पहचान प्रणाली है। इसके साथ ही, मतदाता पहचान पत्र, जिसे स्वयं आयोग जारी करता है, को भी प्रमाण के रूप में अस्वीकार करना आश्चर्यजनक है। यह न केवल मतदाताओं के लिए असुविधा का कारण बन रहा है, बल्कि इसे मनमाना और भेदभावपूर्ण भी माना जा रहा है।

    तीसरा, नागरिकता सत्यापन का मुद्दा: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नागरिकता की जांच गृह मंत्रालय का कार्यक्षेत्र है, न कि चुनाव आयोग का। कोर्ट ने टिप्पणी की, “यदि आपको बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के अंतर्गत नागरिकता की जांच करनी थी, तो आपको पहले कदम उठाना चाहिए था। अब थोड़ी देर हो चुकी है।” यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि आयोग ने अपनी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया हो सकता है।

    चुनाव से ठीक पहले यह सब नहीं होना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट

    वोटर लिस्ट रिवीजन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा

    अगर आप वोटर लिस्ट में किसी शख्स का नाम सिर्फ देश की नागरिकता साबित होने के आधार पर शामिल करेंगे तो फिर यह बड़ी कसौटी होगी। यह गृह मंत्रालय का काम है आप उसमें मत जाइए। उसकी अपनी एक न्यायिक प्रक्रिया है। आपको अगर यह करना है तो फिर इतनी देरी क्यों की यह चुनाव से ठीक पहले नहीं होना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और संवैधानिक दायरा

    सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल थे, ने इस मामले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने माना कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है, जो संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत आता है। हालांकि, कोर्ट ने इस प्रक्रिया के समय और तरीके पर सवाल उठाए, खासकर नागरिकता सत्यापन के मुद्दे पर। कोर्ट ने कहा, “आप वोटर लिस्ट में किसी शख्स का नाम सिर्फ देश की नागरिकता साबित होने के आधार पर शामिल करेंगे, तो यह बड़ी कसौटी होगी। यह गृह मंत्रालय का काम है, आप उसमें मत जाइए।”

    कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या आयोग के पास मतदाता सूची में संशोधन का अधिकार है, इसकी प्रक्रिया क्या है, और समय का औचित्य क्या है। आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि समय के साथ मतदाता सूची में संशोधन आवश्यक है, और यदि आयोग यह नहीं करेगा, तो फिर कौन करेगा? लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और प्रक्रिया की पारदर्शिता और समय पर सवाल उठाए।

    वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा:

    आधार जिसे एक मान्य दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया गया है, सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने इसे बरकरार रखा और पूरा देश आधार के पीछे पागल हो गया और अब एक संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग कहती है कि आधार को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    विपक्ष का रुख और जनता की परेशानी

    बिहार में विपक्षी दल, जिनमें राजद, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, और अन्य शामिल हैं, ने इस प्रक्रिया को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का “गुप्त” संस्करण करार दिया है। विपक्ष का तर्क है कि यह प्रक्रिया खासकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों, जैसे गरीब, अल्पसंख्यक, और ग्रामीण आबादी को निशाना बना सकती है, जिनके पास आवश्यक दस्तावेजों का अभाव हो सकता है। याचिकाकर्ताओं, जिनमें एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और कई विपक्षी नेता शामिल हैं, ने दावा किया कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता), 325 (निष्पक्ष चुनाव), और 326 (वयस्क मताधिकार) का उल्लंघन करती है।

    बिहार के ग्रामीण इलाकों में लोग दस्तावेजों की कमी के कारण परेशान हैं। एक महिला मतदाता के बयान, “हम आधार कार्ड लाए, वोटर कार्ड लाए, स्मार्ट कार्ड लाए, लेकिन वो कहता है बाप-दादा का पहचान पत्र चाहिए, कहां से लाएंगे?” यह दर्शाता है कि यह प्रक्रिया न केवल जटिल है, बल्कि कई लोगों के लिए अव्यावहारिक भी है। खासकर बिहार जैसे राज्य में, जहां साक्षरता दर और दस्तावेजों की उपलब्धता सीमित है, ऐसी शर्तें मतदाताओं को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित कर सकती हैं।

    आधार और मतदाता पहचान पत्र का खारिज होना

    चुनाव आयोग का आधार और मतदाता पहचान पत्र को सत्यापन के लिए अस्वीकार करना सबसे विवादास्पद मुद्दा है। आधार, जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा जारी किया जाता है, देश की सबसे व्यापक पहचान प्रणाली है, और 66 करोड़ से अधिक मतदाताओं के आधार नंबर पहले से ही आयोग के पास उपलब्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाया, “आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में मान्यता क्यों नहीं?” दूसरी ओर, आयोग का तर्क है कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है, केवल पहचान का। लेकिन यह तर्क कमजोर पड़ता है, क्योंकि मतदाता पहचान पत्र, जो स्वयं आयोग जारी करता है, को भी अस्वीकार किया गया है। यह कदम न केवल आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करने से अधिक कुछ और हो सकता है।

    लोकतंत्र और संविधान पर प्रभाव

    यह विवाद लोकतंत्र की जड़ से जुड़ा है, क्योंकि मतदान का अधिकार संविधान का मूलभूत हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह प्रक्रिया मतदान के अधिकार से संबंधित है, और इसे पारदर्शी और निष्पक्ष होना चाहिए। आयोग की प्रक्रिया, खासकर इसका समय और दस्तावेजों की मांग, कई मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित कर सकती है, जो संविधान के अनुच्छेद 326 का उल्लंघन हो सकता है।

    विपक्ष और याचिकाकर्ताओं का यह भी आरोप है कि यह प्रक्रिया एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने का प्रयास हो सकता है। कुछ क्षेत्रों, जैसे किशनगंज, कटिहार, अररिया, और पूर्णिया, जहां अल्पसंख्यक आबादी अधिक है, वहां “जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड” होने का दावा विवाद को और हवा देता है। यह आरोप गंभीर है, क्योंकि यह न केवल चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी प्रभावित कर सकता है।

    लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी कदम : सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और इस प्रक्रिया पर उठे सवाल यह स्पष्ट करते हैं कि चुनाव आयोग को अपनी प्रक्रिया में पारदर्शिता और समावेशिता सुनिश्चित करनी होगी। मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक आवश्यक प्रक्रिया है, लेकिन इसे चुनाव से ठीक पहले और ऐसी शर्तों के साथ लागू करना, जो आम नागरिकों के लिए अव्यावहारिक हों, लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है। आयोग को चाहिए कि वह आधार और मतदाता पहचान पत्र जैसे व्यापक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों को स्वीकार करे और नागरिकता सत्यापन जैसे संवेदनशील मुद्दों को गृह मंत्रालय पर छोड़े।

    अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई, 2025 को निर्धारित की है, और तब तक आयोग को ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित नहीं करने का निर्देश दिया है। यह एक स्वागतयोग्य कदम है, जो यह सुनिश्चित करता है कि प्रक्रिया की वैधता और निष्पक्षता की जांच हो सके। बिहार के मतदाताओं की परेशानी और विपक्ष की चिंताएं यह दर्शाती हैं कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सभी संस्थाओं को संवैधानिक सीमाओं का पालन करना होगा। जैसा कि एक मतदाता ने कहा, “हम अपनी ताकत दिखाने आए हैं।” यह ताकत लोकतंत्र की असली शक्ति है, और इसे कमजोर करने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य है।

    लोकतंत्र जिंदाबाद! जय संविधान!

    Shagun

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