10 फरवरी 2026 को केंद्र सरकार ने Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Amendment Rules, 2026 को अधिसूचित किया, जो 20 फरवरी से लागू होगा। यह नियम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स आदि) के लिए AI-जनरेटेड कंटेंट (सिंथेटिकली जेनरेटेड इंफॉर्मेशन या SGI) पर सख्त दिशा निर्देश लाए हैं।
यह बदलाव डीपफेक, फर्जी वीडियो, वॉइस क्लोनिंग और AI से बने/बदले गए फोटो/ऑडियो की बढ़ती समस्या को रोकने के लिए उठाया गया है। सरकार का कहना है कि अब हर AI-जनरेटेड सामग्री को स्पष्ट रूप से पहचानने लायक बनाना अनिवार्य होगा, ताकि यूजर्स असली और नकली में फर्क कर सकें।
क्या है मुख्य प्रावधान आइए जानते हैं एक नजर में:
- स्पष्ट लेबलिंग अनिवार्य: सभी AI-जनरेटेड या AI से बदली गई सामग्री (फोटो, वीडियो, ऑडियो, ग्राफिक्स) पर प्रमुख (prominent) लेबल लगाना होगा। यह लेबल ऐसा होना चाहिए कि यूजर तुरंत समझ जाए कि कंटेंट सिंथेटिक है।
- परमानेंट मेटाडेटा और आईडेंटिफायर: लेबल के साथ फाइल में ट्रेसेबल मेटाडेटा और यूनिक आईडी एम्बेड करनी होगी, जिसे हटाया या दबाया नहीं जा सकेगा।
- यूजर डिक्लेरेशन: यूजर्स को अपलोड से पहले बताना होगा कि कंटेंट AI से बनाया/बदला गया है या नहीं। प्लेटफॉर्म्स को इसे वेरिफाई करना होगा।
- ऑटोमेटेड टूल्स: प्लेटफॉर्म्स को ऐसी तकनीक लगानी होगी जो गैरकानूनी, अश्लील, धोखाधड़ी वाली या बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी AI सामग्री को रोक सके।
- तेज कार्रवाई: सरकारी आदेश या कोर्ट के निर्देश पर अवैध कंटेंट को 3 घंटे में हटाना अनिवार्य (पहले 36 घंटे थे)।
कुछ संवेदनशील मामलों (जैसे नॉन-कॉन्सेंसुअल डीपफेक या नग्नता) में 2 घंटे में कार्रवाई। - यूजर चेतावनी: हर 3 महीने में यूजर्स को नियमों की याद दिलानी होगी, उल्लंघन पर अकाउंट सस्पेंड, कंटेंट हटाना या कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
यह कदम क्यों महत्वपूर्ण है?
आज के डिजिटल दौर में AI टूल्स इतने आसान और शक्तिशाली हो गए हैं कि कोई भी व्यक्ति मिनटों में किसी नेता, सेलिब्रिटी या आम आदमी का डीपफेक वीडियो बना सकता है। चुनावों में फर्जी वीडियो, व्यक्तिगत बदनामी, फ्रॉड, महिलाओं/बच्चों के खिलाफ अश्लील सामग्री ये सब बढ़ रहे हैं। ऐसे में यूजर्स को धोखा देने वाली सामग्री से बचाना और सच्चाई की रक्षा करना जरूरी हो गया है।
यह नियम पारदर्शिता लाता है : अब कोई वीडियो देखकर तुरंत पता चलेगा कि यह AI से बना है या असली। इससे मिसइंफॉर्मेशन और डीपफेक का दुरुपयोग कम होगा। साथ ही प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी बढ़ेगी वे अब सिर्फ “होस्ट” नहीं रहेंगे, बल्कि सक्रिय रूप से गेटकीपर बनेंगे।
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चुनौतियां और संतुलन की जरूरत
- नियम अच्छे हैं, लेकिन लागू करने में चुनौतियां हैं: छोटे प्लेटफॉर्म्स के लिए तकनीकी लागत ज्यादा हो सकती है।
- AI डिटेक्शन टूल्स अभी परफेक्ट नहीं हैं, खासकर भारतीय भाषाओं और संदर्भों में।
- ओवर-ब्लॉकिंग का खतरा—कुछ असली कंटेंट गलती से हट सकता है।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलन बनाए रखना जरूरी है (जैसे शैक्षणिक, रिसर्च या एक्सेसिबिलिटी वाले कंटेंट को छूट दी गई है)।
सरकार ने कुछ संतुलित कदम उठाए हैं जैसे 10% फिक्स्ड वॉटरमार्क की पुरानी मांग को हटाकर “प्रमुख लेबल” पर फोकस किया, और अच्छे इरादे वाले एडिटिंग को बाहर रखा।
यह बदलाव डिजिटल इंडिया के लिए एक मजबूत कदम है। AI का फायदा तो बहुत है, लेकिन इसका दुरुपयोग रोकना उतना ही जरूरी है। अगर प्लेटफॉर्म्स और यूजर्स दोनों जिम्मेदारी से काम करेंगे, तो सोशल मीडिया ज्यादा सुरक्षित, भरोसेमंद और सच्चाई से भरा होगा।
यह सिर्फ नियम नहीं, बल्कि एक नई सोच है—जहां तकनीक इंसान की सेवा करे, न कि धोखे का हथियार बने। उम्मीद है कि यह कदम देश को डीपफेक और फेक न्यूज के जाल से मुक्त करने में अहम भूमिका निभाएगा। – प्रस्तुति : सुशील कुमार






