- क्या फंस गए हैं ट्रंप और नेतन्याहू ईरान के जाल में?
- पश्चिम एशिया का खिंचता युद्ध : तेहरान की रणनीति कामयाब?
पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर शुरू किया गया युद्ध अब अपने दूसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है, लेकिन रुकने का नाम नहीं ले रहा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे ‘त्वरित और निर्णायक’ अभियान बताकर शुरू किया था, मगर अब सवाल उठ रहा है: क्या ये दोनों नेता ईरान की लंबी, थकाऊ रणनीति के जाल में फंस चुके हैं? विशेषज्ञों की मानें तो तेहरान की सैन्य रणनीति पारंपरिक जीत पर नहीं, बल्कि दुश्मनों को महंगे और लंबे संघर्ष में उलझाने पर टिकी है। जैसे-जैसे युद्ध खिंच रहा है, वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगा रही है, और ट्रंप-नेतन्याहू की ‘जीत की बातें’ खोखली साबित हो रही हैं।
युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को हुई, जब अमेरिका और इजरायल ने तेहरान पर हमले किए और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनी को मार गिराया। ट्रंप ने इसे ‘अमेरिकी सुरक्षा के लिए जरूरी’ बताया, जबकि नेतन्याहू ने 40 साल पुराने सपने की पूर्ति कहा। लेकिन अब, 9 मार्च तक, युद्ध 10वें दिन में है। इजरायल ने नए हमलों की लहर शुरू की है, जिसमें रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के एयर फोर्स हेडक्वार्टर्स और मिसाइल प्रोडक्शन साइट्स को नष्ट किया गया।
ईरान ने जवाब में इजरायल के उत्तरी हिस्सों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए, साथ ही गल्फ स्टेट्स जैसे UAE, सऊदी अरब और कुवैत पर ड्रोन अटैक्स। खामेनी के बेटे मोज्ताबा को नया सुप्रीम लीडर बनाया गया है, जिसे ट्रंप ने ‘अस्वीकार्य’ बताया, लेकिन इजरायल ने चेतावनी दी कि हर उत्तराधिकारी को निशाना बनाएंगे।

ट्रंप ने दावा किया था कि युद्ध ‘4-5 हफ्तों’ में खत्म हो सकता है, लेकिन अब वे कह रहे हैं कि अंत का फैसला नेतन्याहू के साथ ‘म्यूचुअल’ होगा।
यह बयान दर्शाता है कि अमेरिका अब इजरायल की रणनीति पर निर्भर हो चुका है। विशेषज्ञ आमिर अजीमी जैसे विश्लेषक कहते हैं कि ईरान ने पिछले दशक में अपनी रणनीति तैयार की थी सीधे टकराव से बचते हुए, प्रॉक्सी हमलों और लंबे संघर्ष से दुश्मनों को थकाना।
ईरान का मकसद नहीं जीतना, बल्कि अमेरिका-इजरायल को आर्थिक और राजनीतिक रूप से महंगा बनाना है। परिणामस्वरूप, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से ऑयल प्राइस 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गया, स्टॉक्स प्लंज कर रहे हैं—S&P 500 में 1.3% गिरावट, और ग्लोबल इकोनॉमी डगमगा रही है।
भारत, चीन, जापान, रूस जैसे देश बुरी तरह प्रभावित हैं, जबकि अमेरिका को कम नुकसान हो रहा है ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का एक और उदाहरण।
ट्रंप की जिद ने न सिर्फ ईरान को उकसाया, बल्कि तटस्थ देशों को भी नुकसान पहुंचाया। X पर यूजर्स कह रहे हैं कि नेतन्याहू ने ट्रंप को ‘ट्रैप’ किया है, ताकि इजरायल अपने लक्ष्य हासिल कर सके। अमेरिका में सैनिक मौतें बढ़ रही हैं (सातवीं मौत की खबर), और घरेलू राजनीति में विरोध बढ़ रहा है। अगर युद्ध लंबा चला, तो ट्रंप की राजनीतिक छवि को झटका लग सकता है जैसा कि विशेषज्ञ कहते हैं, ‘ट्रंप ईरान को तोड़ सकते हैं, लेकिन ठीक करने का कोई प्लान नहीं।’
निष्कर्ष में, ट्रंप और नेतन्याहू की ‘जीत’ की बातें अभी हवा में हैं। ईरान की सहनशक्ति और रणनीतिक गहराई उन्हें फंसा सकती है एक लंबे, महंगे दलदल में। वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही तहस-नहस हो रही है, और अगर कूटनीति नहीं लौटी, तो यह युद्ध पूरे क्षेत्र को नए द्वेष और असुरक्षा की ओर धकेल देगा। क्या ये नेता समय रहते निकल पाएंगे, या इतिहास उन्हें ‘मिशन क्रीप’ का शिकार मानेगा? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल, ईरान की रणनीति ऊपर लग रही है।






