उपभोक्ता परिषद ने उठाए गंभीर सवाल, निजी घरानों को फायदा पहुंचाने का आरोप
लखनऊ: उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन और राज्य सरकार पर बिजली कंपनियों के निजीकरण के मसौदे में विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 131(2) के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगा है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इस मसौदे को निजी घरानों को अनुचित लाभ पहुंचाने की साजिश करार दिया है। परिषद का कहना है कि निजीकरण की प्रक्रिया में कानूनी और वित्तीय नियमों की अनदेखी की गई, जिससे सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग हो रहा है।
उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने बताया कि विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 131(2) के तहत निजीकरण से पहले बिजली कंपनियों के 25 साल के राजस्व संभावना (रेवेन्यू पोटेंशियल) का आकलन कर परिसंपत्तियों (एसेट) की वैल्यू निर्धारित करना अनिवार्य है। लेकिन पावर कॉरपोरेशन ने ऐसा नहीं किया। वर्मा के अनुसार, यदि यह आकलन किया जाता तो दक्षिणांचल और पूर्वांचल के 42 जनपदों की बिजली कंपनियों की वैल्यू इतनी बढ़ जाती कि देश का कोई भी निजी घराना इनमें से एक भी कंपनी खरीदने की स्थिति में नहीं होता।
परिषद ने यह भी आरोप लगाया कि धारा 133 के तहत निजीकरण से पहले अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए अंतरण स्कीम घोषित करना जरूरी था, जो नहीं किया गया। यह दोनों मामले विद्युत अधिनियम 2003 का स्पष्ट उल्लंघन हैं। वर्मा ने चेतावनी दी कि यदि पावर कॉरपोरेशन ने मसौदा वापस नहीं लिया, तो विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार के लखनऊ लौटते ही परिषद धारा 131(2) के उल्लंघन के खिलाफ लोक महत्व का प्रस्ताव दाखिल करेगा।
उपभोक्ता परिषद ने मांग की है कि निजीकरण की प्रक्रिया में सभी वैधानिक, वित्तीय और तकनीकी पहलुओं का पारदर्शी अध्ययन किया जाए। परिषद ने सवाल उठाया कि पिछले आठ महीनों से पावर कॉरपोरेशन जिस तरह की प्रक्रिया अपना रहा है, उससे लगता है कि इसका मकसद केवल निजी घरानों को लाभ पहुंचाना है। यह मामला गंभीर जांच का विषय है।निष्कर्ष: उपभोक्ता परिषद ने स्पष्ट किया कि वह सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग और कानूनी उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं करेगी। पावर कॉरपोरेशन को तत्काल मसौदा वापस लेने की सलाह दी गई है, अन्यथा परिषद कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार है।







