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पंकज चतुर्वेदी
लखनऊ से फ़ैज़बाद वाले मुख्य हाई वे पर चिनहट एक मुकाम है। यह जगह यो अब लखनऊ शहर की जद में आ चुकी है। यहीं से देवा की और एक रास्ता जाता है। यह स्थान एक सूफी की दरगाह के लिए मशहूर है।
हाजी वारिश अली शाह की दरगाह पर खेली जाने वाली होली की सबसे ख़ास बात यह होती है कि जो इनका सन्देश था कि “जो रब है वही राम” की पूरी झलक इस होली में साफ़-साफ़ दिखाई देती है। देश भर से हिन्दू, मुसलमान, सिख यहाँ आकर एक साथ हाजी वारिश अली शाह की दरगाह पर होली खेलते है और एकता का सन्देश देते है। इस होली में हिन्दू-हिन्दू नहीं मुस्लमान मुस्लमान नहीं सिख सिख नहीं बल्कि सब इंसान होकर होली खेलते है। रंग, गुलाल और फूलों से विभिन्न धर्मों द्वारा खेली जाने वाली होली देखने में ही अदभुत नजऱ आती है। सैकड़ों सालों से चली आ रही। यहाँ होली खेलने की परंपरा आज के विघटनकारी समाज के लिए आदर्श प्रस्तुत करती है।
भक्त इन्हें भगवन कृष्ण का अवतार भी मानते हैं
हाजी वारिश अली शाह की मजार का निर्माण उनके हिन्दू मित्र राजा पंचम सिंह ने कराया था और इसके निर्माण काल से ही यह स्थान हिन्दू-मुस्लिम एकता का सन्देश देता आ रहा है। यहाँ आने वाले जायरीनो में जितना मुस्लिम जायरीन आता है उसे कहीं ज्यादा हिन्दू जायरीन आता है। कहीं-कहीं तो हिन्दू भक्त इन्हें भगवन कृष्ण का अवतार भी मानते हैं और अपने घरों एवं वाहनों पर श्री कृष्ण वारिश सरकार का वाक्य भी अंकित कराते हैं। कुछ भी हो मगर धर्मं की टूटती सीमाए यहां की होली में देखना एक ताज़ा हवा के झोंके के समान है। देवा शरीफ में खेली जाने वाली होली यह अपने आप में अनूठी है।
यहां पहले एक जुलूस निकलता है-चांचड़ यात्रा। यह पूरे कस्बे से गुजरती है फिर मज़ार पर 15 कुंतल रंग अबीर गुलाल को उड़ाया जाता है। हर जाति,धर्म, सम्प्रदाय के लोग प्रेम और सौहार्द के रंग में रंग जाते हैं।
मथुरा की होली की तो बहुत चर्चा होती है ,कभी भारत के इस प्रेम रंग में भी डूबें।