- इस मामले पर उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने प्रदेश के ऊर्जा मंत्री से की मुलाकात, सौपा ज्ञापन
- ऊर्जा मंत्री ने कहा: प्रदेश के उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ने दिया जायेगा कोई भार, कानून में संशोधन हेतु होगा उचित प्रयास
लखनऊ, 05 नवंबर 2018: पूरे देश के कोयला आधारित उत्पादन गृहों की गीली राख को फ्री में डिस्पोज करने पर 300 किमी. की परिधि तक उत्पादन निगमों को भाड़ा भी वहन किये जाने के मामले पर भारत सरकार द्वारा बनाये गये कानून जिसके चलते बिजली उपभोक्ताओं पर बड़ा भार पड़ना तय है, के विरोध में उप्र राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष व विश्व ऊर्जा कौंसिल के स्थायी सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने आज इस पूरे मामले पर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्री श्रीकान्त शर्मा से सचिवालय स्थित उनके कार्यालय में मुलाकात कर इस मामले पर गंभीर चर्चा की और कानून में भारत सरकार ऊर्जा मंत्रालय से उसमें संशोधन कराने हेतु एक ज्ञापन सौपा।
उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष द्वारा ऊर्जा मंत्री के सामने पूरा मामला रखते हुये यह बताया गया कि यदि यह कानून लागू होता है, तो फ्री में गीली राख के निस्तारण पर हजारों करोड़ रूपया उत्पादन निगम को खर्च करना होगा और जिसका खामियाजा प्रदेश की जनता भुगतेगी। ऐसे में कानून मं संशोधन कराया जाय कि फ्री में राख ले जाने वाली एनएचएआई ही द्वारा पूरा भाड़ा वहन किया जायेगा।
बता दें कि इस मामले पर ऊर्जा मंत्री श्री श्रीकान्त शर्मा ने यह आश्वासन दिया कि किसी भी हालत में इसका भार प्रदेश के विद्युत उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ने दिया जायेगा। उपभोक्ता परिषद द्वारा सौपे गये जनहित ज्ञापन पर सरकार गम्भीरता से विचार कर आवश्यक संशोधन कराने की दिशा में उचित कदम उठायेगी, जिससे प्रदेश की जनता को कोई भी दिक्कत न हो।
उपभोक्ता परिषद द्वारा अपने जनहित ज्ञापन में यह मुद्दा उठाया गया कि केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2016 और अब अगस्त, 2018 में बनाये गये कानून के तहत देश के कोयला आधारित बिजली उत्पादन गृहों द्वारा बिजली पैदा करने के लिए कोयले का उपयोग करने के पश्चात् जो गीली राख पाण्ड में एकत्र होती है उसे डिस्पोज करना जरूरी होता है, जिससे प्रदूषण न फैले। अक्सर इसका उपयोग भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) द्वारा नये एक्सप्रेस वे बनाने में उपयोग किया जाता था, लेकिन अब भारत सरकार ने जो कानून बनाया है उसके तहत देश के बिजली उत्पादन गृहों को अपनी गीली राख एनएचएआई को फ्री में तो देना ही होगा, उल्टे उसे 300 किमी रेडियस तक ट्रक का भाड़ा भी देना होगा।
वर्तमान में 200 किमी. तक एक टन गीली राख का किराया लगभग रू0 1700 लेने की बात हो रही है। उत्तर प्रदेश में उत्पादन निगम के सभी उत्पादन गृहों में वर्तमान में लगभग 754 लाख टन राख पाण्ड में एकत्र है। यदि उसे भविष्य में खाली कराया जायेगा तो उसे अपनी राख तो फ्री में देना ही होगा बल्कि उसे ले जाने के लिए लगभग रू0 12818 करोड़ भाड़े पर खर्च करना होगा। निश्चित तौर पर जिसका भार प्रदेश के विद्युत उपभोक्ताओं की बिजली दरों में पड़ेगा, जो अपने आप में चैंकाने वाला है।
एनएचएआई या राज्य सरकार द्वारा कोई भी हाईवे बनाया जाता है तो उस पर प्रदेश की जनता चलने पर टोल टैक्स जमा करती है ऐसे में यहाँ तो प्रदेश के विद्युत उपभोक्ताओं को दोहरी मार झेलनी पड़ेगी। पहले बिजली दर में भुगते और जब हाईवे पर चले तो टोल टैक्स भरे। ऐसे में उपभोक्ता परिषद केन्द्र की मोदी सरकार से नये कानून में संशोधन हेतु यह माँग करती है कि राख को फ्री में भले ही ले जाया जाये लेकिन उसको ले जाने का भाड़ा देश के उत्पादन गृहों से एनएचएआई द्वारा न वसूला जाये। बल्कि इसके एवज में विभाग को कुछ पैसा भी दिया जाना चाहिए। यह विधिक तौर पर भी सही है, क्योंकि हाईवे अपनी प्रोजेक्ट कास्ट में सभी रकम जोड़ लेगा।






