डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भगवान राम और माता सीता के साथ लक्ष्मण जी भी वनवास पर गए थे। वह तपस्वी की भांति प्रभु की सेवा में लीन रहे। इधर अयोध्या में भरत का जीवन भी तपस्वी जैसा ही था। वह चौदह वर्षों तक इसी रूप में राजधर्म का निर्वाह करते रहे। इन चौदह वर्षों बाद श्री राम और भरत मिलन विलक्षण रहा होगा। देवता भी इस मनोरम दृश्य के साक्षी थे। काशी के नाटी इमली में इसी को चरितार्थ करने का प्रयास प्रतिवर्ष होता है।
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥

रामकथा केवल भारत ही नही विश्व के अनेक देशों में प्रचलित है। इसी प्रकार इन सभी देशों में रामलीला भी लोकप्रिय है। इसमें भी भरत मिलाप का दृश्य अद्भुत होता है। एक तरफ इतिहास में सिंहासन के लिए भाई भाई में हिंसक संघर्ष के अनेक उदाहरण है, वहीं रामकथा में भरत जैसे भाई है,जो चौदह वर्षों तक उस सिंहासन पर नहीं बैठे जिसे वह श्री राम का मानते थे। भरत ने चौदह वर्षों तक सिंहासन पर श्री राम की खड़ाऊ रखकर स्वयं तपस्वी की तरह शासन किया। श्री राम ने वादा किया था कि चौदह वर्ष बाद अयोध्या लौटकर वह शासन ग्रहण करेंगे। इस अवधि के बाद एक एक पहल बिताना भरत के लिए कठिन था।

अंततः श्री राम वापस लौटते है। भरत को गले लगाते है, यह दृश्य निश्चित ही अद्भुत व अलौकिक रहा होगा।
पिछले चार सौ पचहत्तर वर्षों से काशी के नटी इमली भरत मिलाप में इसका मंचन होता है। इस दृश्य को देखने दूर दूर से लोग आते है। यहां के दृश्य को देखकर भावविह्वल होते है। परम्परा के अनुसार काशी नरेश भी हांथी पर सवार होकर आते है। हर हर महादेव और जय श्रीराम के उद्घोष से आसमान गूंज उठता है।
यह विश्वप्रसिद्ध भरत मिलाप गोधूलि बेला में ही होता है। भगवान राम अन्य भाइयों के साथ विशेष रूप में भरत को गले लगाते है। इस पूरे दृश्य को यथासंभव सजीव बनाने का प्रयास होता है। पुष्पक विमान पर सवार होकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम नाटी इमली मैदान में पहुंचते है। काशी नरेश पुष्पक विमान की परिक्रमा करते है। शगुन भेंट करते है। पूरा दृश्य अति मनोरम होता है। अनेक विशेषताओं ने इस भरत मिलाप को विश्व प्रसिद्ध बना दिया है-
“मिलनि प्रीति किमि जाइ
बखानी।
कबिकुल अगम करम मन बानी॥
परम प्रेम पूरन दोउ भाई।
मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥”







