जी के चक्रवर्ती
अपने ही घर में जब आग लगी हो तो दूसरे के दरवाजे की ओर अंगुली उठाना कहाँ की अकलमंदी हैं यह बात समझ से परे है लेकिन हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में अबतक हुए लगभग सभी हुक्मरानों ने अपने घर में लगी आग को न बुझा पाने का दोषी पड़ोसी देश भारत के माथे मढ़ने में लगा रहता है। वहां के मौजूदा हालात ऐसे है कि एक ओर जहां प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ पाकिस्तान में बगावत की आग धधकती चली जा रही है तो दूसरी ओर इमरान खान इस प्रयास में लगे हुए हैं कि किस तरह से वह भारत को अस्थिर कर सकें।
पाकिस्तान के हालत ऐसे हैं कि वहां के सबसे बड़े धार्मिक गुट जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख मौलाना फजलुर्रहमान की अगुवाई में बहुत बड़ी संख्या में लोगों का जत्था जुलूस की शक्ल में इमरान खान के इस्तीफा मांगने की आवाज बुलंद करते हुये इस्लामाबाद पहुंच गयें है। जिससे वहां की स्थिति ऐसी बन गयी हैं कि यदि आम लोगों की इस भीड़ के गुस्से की धधक रही आग पर राजनीतिक घी डाल दिया गया तो इमरान खान का तख्ता पलट होते देर नही लगेगी। हालांकि वहां सरकार ने लोगों के इस भीड़ का सामना करने के लिये जरूरी उपाय किये हैं, लेकिन इन सब बातो से यही स्प्ष्ट होता है कि बहुत जल्दी ही पाकिस्तान में नई परेशानियाँ खड़ी होने जा रही है।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि नया पाकिस्तान बनाने और वहां एक नई बयार बहाने जैसी बातों के वादे के साथ इमरान खान ने वहाँ की सत्ता संभाले केवल चौदह महीने ही गुजारे हैं। लेकिन इस बीच गरीबी, महंगाई एवं बेरोजगरी जैसी हालातों ने वहां के लोगों को इस कदर बदहाल कर दिया है कि वहां की विपक्षी पार्टियों को इसी को मुद्दा बना कर विरोध जताने का एक ठोस आधार मिल गया है।

वहां की पार्टियां लोगों की रोजमर्रे की परेशानियों से जुड़े मुद्दों के सहारे लोगों को अपने पक्ष करके सड़क पर उतर आयी हैं। बढ़ते विरोध प्रदर्शनों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ अब इमरान की विदाई के नारे लगाए जाने लगे हैं। प्रश्न यह है कि सवा साल के भीतर ही पाकिस्तान की वर्तमान सरकार ने जमीनी स्तर पर ऐसा कौन सा रुख अपनाया है कि जिसकी वजह से आम जनता को बगावत के लिये सड़क पर आना पड़ा है? आखिरकार इतने कम दिनों में ऐसी स्थिति कैसे उतपन्न हो गयी कि विरोधियों को रोकने के लिए वहां के सड़कों-गलियों में गहरे गड्ढे खोदने पड़ रहे हैं, भीड़ को रोकने के लिए बहुत बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात कर कंटेनर खड़े किए गए हैं।
यह दूसरी बात है कि जमीयत के नेता मौलाना फजलुर्रहमान के जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम और उसकी राजनीतिक शाखा अंसार-उल-इस्लाम का मुख्य बेस तो पाकिस्तान के बलूचिस्तान एवं खैबर पख्तूनख्वा में है, लेकिन यह लोग जब इमरान खान के खिलाफ उनके इस्तीफे की मांग के नारे लगाते हुये इस्लामाबाद जा पहुंचे तो निश्चित रूप से उसे कुछ दूसरी विपक्षी पार्टियों का भी समर्थन प्राप्त होगा। यही कारण है कि पहले- पहल इमरान खान की सरकार द्वारा जुलूस को हल्के तौर पर लिया गया था, अब उसे रोकने के लिए उनसे गुजारिश करने से लेकर सख्ती करने जैसी कार्यवाही करने के लिए कैसे तैयार हो गये है।
ऐसे में जाहिर सी बात है, कि ताजा विरोध की शक्ल बहुत ज्यादा जोर पकड़ने के बाद से इमरान खान की बेचैनी का बढ़ जाना स्वभाविक सी बात है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि यदि इमरान खान के प्रति उन्ही के देश के भीतर इस कदर विरोध हो रहा है तो तो क्या उन्हें अपना ध्यान उससे निपटने एवं देश को संभालने में लगाये जाने के स्थान पर जबरन भारत की छवि अंतरास्ट्रीय स्तर पर खराब करने में अपनी ध्यान एवं समस्त ऊर्जा व्यर्थ करना क्या उचित होगा?







