हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है

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  • जीतना बड़ा संघर्ष होगा, जीत उतनी ही शानदार होगी: विश्व आध्यत्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद
  • हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखिए कि आप क्या सोचते हैं

स्वामी विवेकानंद जन्मदिवस विशेष:

आज स्वामी विवेकानंद का जन्मदिवस है, जिसे सम्पूर्ण देश युवा दिवस के रुप में मनाता है। भारतीय भूमि में समय – समय पर अनेकों महापुरुषों ने जन्म लिया विवेकानंद उन महापुरुषों में से एक थे जिन्होंने हमारे भारत की पहचान सम्पूर्ण दुनिया के लोगों से कराया।

स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम- नरेन्द्र था, (उनका पूरा नाम- नरेंद्रनाथ दत्त था) परंतु संपूर्ण विश्व में वे स्वामी विवेकानंद के नाम से विख्यात हुये। स्वामी विवेकानंद का जन्म वर्ष 1863 ईo में कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध “ईश्वरचन्द्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट” अंग्रेजी स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात, वर्ष 1884 में पेरिडेन्सी कॉलेज से बी.ए. की डिग्री प्राप्त की।
बाल्यवस्था से ही स्वामी विवेकानंद में आध्यात्मिक जिज्ञासा अत्यंत प्रवल होने के कारण उनके यौनवस्था युवा अवस्था तक आते आते वे ब्रह्म समाज के अनुयायी बन गए।

उन दिनों स्वामी विवेकानंद सत्य की खोज में इधर-उधर भटक रहे थे कि एक दिन अपने कॉलेज से लौट कर गंगा किनारे घूमने निकले तो वहां रामकृष्ण परमहंस को योगमुद्रा में बैठे देखा इसी प्रकार वे प्रतिदिन उन्हें देखते-, देखते जब उनसे रहा नही गया तो उन्होंने उस व्यक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से रामकृष्ण परमहंस के निकट पहुंच कर जोर से आवाज लगा कर उन्हें हिलाते हुये पुकारा लेकिन वे टस से मस नही हुये और निष्प्राण उसी अवस्था बैठे रहे उन्हें छोड़ कर विवेकानंद अपने घर लौट आये लेकिन यह जिज्ञासा कि वह व्यक्ति प्रतिदिन वहां बैठ कर क्या करता है? यह बात नवयुवक नरेन्द्र के दिलोदिमाग में छाया रहा बस यही एक ही प्रश्न उनके मष्तिष्क में उमड़ता रहा।

एक दिन कौतूहल बस विवेकानंद ने एक जलती हुई चिलम ली और रामकृष्ण के पास पहुंच कर उनके नंगी पीठ में चिलम को जोर से ठूंस दिया फिर भी उस व्यक्ति पर इसका कोई असर नही हुआ वे चुपचाप अपने ध्यान में मग्न रहे। विवेकानंद उस चिलम को उसी भांति बहुत देर तक उनके पीठ से लगये रहे थोड़ी देर में चमड़ी के जलने की दुर्गंध उठने लगी अब भी वह व्यक्ति मौन उसी उसी मौनावस्था मे आराम से बैठ रहा। हार मानकर नरेन्द्र घर चलने के लिए जैसे ही मुड़े पीछे से एक आवाज आयी अरे नरेन्द्र क्या तुम्हारी परीक्षा एवं जिज्ञासा शांत हुई? यह बात सुनकर नरेन्द्र हैरान अर्श्चरचकित हो कर परमहंस को देखते रहे। कुछ क्षण बाद विवेकानंद बोले हे महात्मा आप के पीठ पर जलती चिलम का कोई भी प्रभाव नही पड़ा। आखिर यह सब आपने कैसे किया आप मुझे भी यह विद्या सीख दीजिए इस पर रामकृष्ण बोले यह विद्या सीखना चाहते हो तो तुम मेरे पर्ण कुटी में आओ मैं तुम्हे यह विद्या सिखाऊंगा। विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस से तत्वज्ञान की दीक्षा लेकर उनके शिष्य हो गये।

imaging by: shagun news india .com

शिकागो में भारत का प्रतिनिधित्व:

25 वर्ष की यौवनावस्था में ही नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया, तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही सम्पूर्ण भारतवर्ष की यात्रा कर लिया। स्वामी विवेकानंद विदेश भ्रमण करने के उद्देश्य से 31 मई 1893 को अपनी यात्रा प्रारम्भ कि और जापान के कई शहरों जैसे (नागासाकी, कोबे, योकोहामा, ओसाका, क्योटो और टोक्यो ) का दौरा करते हुए चीन एवं कनाडा होते हुए अमेरिका के शिकागो शहर पहुँचे जहां पर सन्‌ 1893 में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म सभा का आयोजन किया गया था। स्वामी विवेकानन्द उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित हुये थे। योरोप-अमरीका के लोग उस वक्त तक पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखा करते थे। इस सभा के आयोजकों ने भास्क प्रयास किया कि स्वामी विवेकानन्द को बोलने का समय न दिया जाये।

शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे विवेकानंद को एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयासों से उन्हें बोलने के लिये मात्र एक मिनट का वक्त मिला। लेकिन मात्र एक मिनट में कोई क्या बोल सकता है फिर भी जब उन्हें बोलने को मिला तो मात्र उस सभा को संबोधन करने मात्र ही उन्हें आगे और बोलने का मौका मिल गया और वे लगातार बोलते चले गये। (“My brother and sister, of America” ) “मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनो” के साथ पूरे सभा को संबोधन करते ही सभागार कई मिनटों तक तालियों की गूंज से गूंजती रही. इस पल को दुनिया आज भी याद कर रोमांचित हो उठती है। इस सभा मे उनके दिये वक्तव्य के कारण भारत एवं उनको पूरी दुनिया मे जाना जाता है। उनके इस प्रकार संबोधन के प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था उनके द्वरा बोला गया एक संस्कृत शोलोक जो इस प्रकार था – ‘रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम… नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव…’ इसका अर्थ है – जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद्र में गिर कर मिल जाती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, जो देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, परंतु सभी मार्ग ईश्वर तक ही जाते हैं।

उस सभा मे उनके द्वारा दिये गए वक्तव्य के उनके विचार सुनकर सभी विद्वान आश्चर्य चकित हो गये। उसके बाद उन्हें उस सभा मे पूरे एक घंटे तक बोलने का समय दिया गया। उसके बाद से तो अमरीका में उनका बहुत अधिक स्वागत किया जाने लगा यह क्रम वादस्तूर आज भी कायम है जज8सके कारण वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया। तीन वर्षों तक अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय आध्यात्म के तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली एवं ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें “साइक्लॉनिक हिन्दू” का नाम दिया था। “अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा” ऐसा स्वामी विवेकानन्द जी का दृढ़ विश्वास था। अमरीका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं। अनेक अमरीकी विद्ववान व्यक्ति उनके शिष्य बन गये। स्वामी विवेकानंद हमेशा अपने आप को ‘गरीबों का सेवक’ कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।

स्वामी विवेकानंद ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड एवं यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रचार -प्रसार किया और कई सार्वजनिक एवं निजी व्याख्यानों का आयोजन भी किया। भारत में विवेकानंद को एक देशभक्त संन्यासी के रूप में माना और सम्मान दिया जाने लगा। उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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