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    Home»ब्लॉग

    बुद्धिजीवि होने के खतरे

    By August 3, 2017Updated:August 3, 2017 ब्लॉग No Comments3 Mins Read
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    अंशु माली रस्तोगी

    मैं बुद्धिजीवियों के मोहल्ले में रहताजरूर हूं मगर खुद बुद्धिजीवि नहीं हूं। उनसे हमेशा दस-बीस कदम की दूरी रखता हूं। उन्होंने कई दफा कोशिश की कि मैं उनकी बुद्धिजीवि मंडली में शामिल होकर उन जैसा बन जाऊं लेकिन हर दफा मैंने खुद को उनसे बचाया ही लिया। साफ शब्दों में उनसेकह दिया- मुझे बुद्धिजीवि बनने का नतो शौक है न कोई हसरत। बुद्धिजीवियों जैसी ऐलीट टाइप जिंदगी मैं नहीं जीना चाहता।

    हालांकि बुद्धिजीवि होना बड़ा ‘साहस’ का काम है। मगर साथ ही उसक ‘खतरे’ भी हैं। साहस और खतरों से मैंने हमेशा बचने की कोशिश की है। बुद्धिजीवि ‘शाब्दिक लफ्फबाज़ी’ में बेहद सहासी होताहै। अपने नेताओं को ही देख लो। मैं देश के प्रत्येक नेता को बुद्धिजीवि मानता हूं! नेताओं की कथनी-करनी में अंतर होने के बावजूद उनमें इतना साहस होता है, जिसके बल पर वो सत्ता में पांचसाल तक आराम से टिके रहते हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि नेता नोट और वोट से चुनाव जीतते हैं, मगर मेरा इस ‘पिछड़ी मान्यता’ में कतई विश्वास नहीं। नेता केवल ‘बुद्धि’ के बल पर ही चुनाव जीतते हैं। जनता को रिझाने के लिए किसी नोट या वोट की नहीं सिर्फ बुद्धि की आवश्यकता होती है।किस जरूरी मुद्दे पर जनता को अपनी ओर खींचना है। कैसे उनमें अपने प्रति विश्वास को जीवितरखना है। कैसे उनकी रोटी खाकर उनके झोपड़े में सोना है। इस सब ‘त्याग’ के लिए बुद्धि की हीजरूरत पड़ती है, नोट की नहीं।

    अगर आप बुद्धिजीवि हैं तो वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजी बड़ी आसानी से कर सकते हैं। आतंकवाद, भूख, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ, खेती-किसानी जैसे मुद्दों पर सेमिनारों मेंजाकर खुलकर वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजियां करें, कोई आपको रोकेगा-टोकेगा नहीं, क्योंकिआप बुद्धिजीवि हैं। बुद्धिजीवि बनकर आप कैसे भी वैचारिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक आदिखतरों पर ‘सिर्फ चिंता’ व्यक्त कर सकते हैं। ध्यान रखें, बुद्धिजीवि कभी सड़कों पर नहीं निकलते। वेठंडे कमरों में बैठकर ही गर्म योजनाएं बनाते-बिगाड़ते रहते हैं।

    दूसरी तरफ, हमारे साहित्यकार राजनीतिक बुद्धिजीवियों से दो-चार कदम हमेशा आगे रहते हैं। नेता चाहे जितना बड़ा या छोटा हो पांच साल में एक बार जनता के बीच उसे जाना ही होता है, वोटमांगने। लेकिन साहित्यकार पांच साल तो क्या पचास साल में एक बार भी जनता के बीच जानापसंद नहीं करता। बात भी सही है, साहित्यकार जनता के बीच क्यों जाए! जनता शायद जानती नहींकि साहित्यकारों को सामाजिक व जनहितैषी मुद्दों को उठाने के लिए किस कदर ‘वैचारिक जमा-खर्च’ करना पड़ता है। इस काम में बुद्धि तो खर्च होती ही है न! आखिर वे वैचारिक बुद्धिजीवि जोठहरे। जनता अपनी फिक्र खुद करे। उनकी समस्यों से किसी साहित्यिक बुद्धिजीवि का भला क्यालेना-देना?

    इसीलिए मैं हर दम यही गुज़ारिश अपने तमाम पाठकों-मित्रों से करता रहता हूं कि मुझे न’बुद्धिजीवि’ समझें, न मानें।

    मैं ‘साधारण व्यक्ति’ के तौर पर ही रहना और मरना चाहता हूं। बुद्धिजीवि बनकर कैसा भी ‘पाप’ मैंअपने सिर नहीं लेना चाहता। बुद्धिजीवि होना कितना ख़तरनाक है, इसे नेताओं-साहित्यकारों सेबेहतर भला कौन जान-समझ सकता है!

    चिकोटी से साभार

    #Anshu Mali Rastogi

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