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    गांधीजी की इच्छा अब साकार होगी?

    By December 8, 2017 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    श्याम कुमार 

    यह पहला अवसर है कि कोई व्यक्ति किसी पार्टी का अध्यक्ष बना हो तो इस पर पार्टी के लोगों को जितनी खुशी हुई हो, उतनी ही खुशी उस पार्टी के विरोधियों को भी हुई हो। राहुल गांधी उर्फ पप्पू के कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनने पर ऐसा ही हुआ है। वैसे, वास्तविकता यह है कि कांग्रेस पार्टी में भी खुशी को दो भागों में बांटा जा सकता है। पार्टी में बहुत बड़ा खेमा ऐसा है, जो वंशवाद के विरुद्ध है और पार्टी के पतन का मुख्य कारण वंशवाद को ही मानता है। लेकिन पिछले सत्तर वर्षों में कांग्रेस को नेहरू वंशवाद ने अपने शिकंजे में इस बुरी तरह जकड़ लिया कि पार्टी के अधिकांश लोग उसके आदी हो गए और वे उस शिकंजे में अपनी खुशी महसूस करने लगे। किन्तु जो लोग इस विचार के नहीं थे, उन्होंने अपनी हिम्मत खो दी और सिर झुकाने में ही अपनी खैरियत समझी। वरना कोई कारण नहीं है कि कर्णसिंह-जैसे योग्य एवं वरिष्ठ नेता भी पप्पू के राज्याभिषेक पर चाटुकारी भरे शब्दों में खुशी जाहिर करते। जब ये वरिष्ठ लोग पप्पू की चापलूसीभरे शब्दों में प्रशंसा कर रहे थे तो उस समय टीवी देख रहे अनेक लोगों के सिर शर्म से झुक गए।

    कांग्रेस पार्टी में जिस समय वास्तविक महान नेताओं का बाहुल्य था, उस समय कांग्रेस का स्वरूप श्रेष्ठ एवं लोकतांत्रिक था। किन्तु धीरे-धीरे जैसे-जैसे उन वास्तविक महान नेताओं का अंत होता गया, वैसे-वैसे पार्टी पर जवाहरलाल नेहरू का वर्चस्व बढ़ता गया। जवाहरलाल नेहरू का चरित्र पूरी तरह स्वार्थी था। जिस प्रकार उन्होंने कुटिलता का सहारा लेकर प्रधानमंत्री बनने के सरदार पटेल के हक को छीन लिया था, वही कुटिलता नेहरू के पूरे जीवन में व्याप्त रही। नेहरू ने फर्जी सेकुलरवाद, फर्जी समाजवाद आदि अनेक बुराइयों के साथ एक और बड़ी बुराई को जन्म दिया, जो हमारे समाज में आगे चलकर घोर सड़ान्ध बन गई। वह बुराई है भाई-भतीजावाद। नेहरू ने अपने तमाम अयोग्य रिश्तेदारों को ऊंचे-ऊंचे पदों पर आसीन कर दिया।

    भारत की राजनीति में वंशवाद भी नेहरू की ही देन है। जब कांग्रेस के वास्तविक महान नेता समाप्त हो गए और नेहरू को अपने लिए मैदान खाली दिखाई दिया तो उन्होंने इन्दिरा गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाने का निश्चय कर लिया। इन्दिरा गांधी अपने पति के साथ रहने के बजाय अपने पिता के निवास ‘तीनमूर्ति भवन’ में, जो राजमहल से भी अधिक आलीशान था, रहने लगीं। नेहरू इन्दिरा गांधी को तरह-तरह से प्रशिक्षित करने लगे। वह उन्हें विदेश-यात्राओं में भी अपने साथ ले जाने लगे। लालबहादुर शास्त्री ने एक जगह स्वीकार किया था कि नेहरू अपने बाद इन्दिरा गांधी को ही प्रधानमंत्री बनवाना चाहते थे। नेहरू ने स्वयं प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया था | तिकड़मबाजी के गुर इन्दिरा गांधी ने अपने पिता से सीख लिए थे और पिता की तरह ही कामराज का सहारा लेकर उन्होंने अपने पैर पसार लिए। लालबहादुर शास्त्री से एक चूक हो गई थी, जिसका फायदा इन्दिरा गांधी ने खूब उठाया। लालबहादुर शास्त्री ने अपने मंत्रिमण्डल में इन्दिरा गांधी को सम्मिलित कर लिया और उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्री बना दिया। यदि शास्त्री जी इन्दिरा गांधी को मंत्री न बनाते तो धीरे-धीरे वह मुख्य धारा से अलग हो जातीं। लेकिन शास्त्री जी ने उन्हें मंत्री बनाकर तो गलती की ही, उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सौंपकर और बड़ी गलती कर दी। इस विभाग का इन्दिरा गांधी ने बहुत फायदा उठाया और जमकर अपना प्रचार किया। लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री पद पर मात्र २० महीने कुछ दिन ही रह पाए और रूस में उनकी हत्या हो गई। इसके बाद चाणक्य माने जाने वाले कामराज की रणनीतिक मदद से इन्दिरा गांधी को सत्ता पर कब्जा जमाने का अवसर मिल गया।

    नेहरू ने वंशवाद का जो पेड़ लगाया था, उसे इन्दिरा गांधी ने वटवृक्ष-जैसा रूप दे दिया। उन्होंने खुलकर वंशवाद का खेल खेला। पहले अपने छोटे बेटे संजय गांधी को अपने उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाया और जब दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई तो राजीव गांधी को सामने ले आईं। संजय गांधी ने तो देश को अच्छी दिशा देने के कुछ काम किए, किन्तु राजीव गांधी की दशा ढोल में पोल थी। इन्दिरा गांधी ने अपनी क्रूर तानाशाही से पार्टी को मनोवैज्ञानिक रूप से ‘नेहरू वंशवाद’ की मानसिक गुलामी में इतना जकड़ दिया था कि कांग्रेसी यह मानने लगे थे कि उनकी नाव का खेवनहार सिर्फ नेहरू वंश ही हो सकता है। राज इलाहाबादी का शेर है- ‘इतने मानूस सय्याद से हो गए, अब रिहाई मिलेगी तो मर जाएंगे’।

    लोगों को आश्चर्य है कि सोनिया गांधी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में राहुल गांधी (पप्पू) को ही क्यों चुना। लोगों का कहना है कि यदि वह प्रियंका गांधी को उत्तराधिकारी चुनतीं तो प्रियंका को नेता बनाने में सोनिया को कम मेहनत करनी पड़ती। शायद सोनिया गांधी के दिमाग में बेटी से अधिक बेटे का महत्व था। वैसे, इतिहास के पन्नों में यह बात तो दर्ज हो ही गई है कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी (पप्पू) को नेता बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। लोग मजाक में कहने लगे कि सोनिया गांधी राहुल को नेता बनाने के लिए जमीन-आसमान एक करते हुए जो अतिकठोर परिश्रम कर रही हैं, उससे बहुत कम परिश्रम से किसी गधे को घोड़ा बनाया जाना सम्भव हो सकता था। राहुल गांधी की हर हरकत बचकानी एवं मूर्खतापूर्ण सिद्ध होने लगी। कभी अपनी ही सरकार के फैसले वाले कागज को फाड़ देना, कभी सार्वजनिक सभा में कुरते की फटी जेब दिखाना, कभी पांच हजार रुपये निकालने की बात कहकर बैंक की लाइन में लग जाना, आदि-आदि अनगिनत हास्यास्पद हरकतें। स्थिति यहां तक हो गई है कि राहुल गांधी का नाम आते ही लोग हंस पड़ते हैं। अपनी ऐसी हरकतों के कारण ही पूरे देश में वह ‘पप्पू’ के नाम से मशहूर हो गए हैं।

    ऐसा लगता है, जैसे उनका हर कदम सोनिया गांधी द्वारा उनके पास तैनात की गई मंडली की राय के अनुसार होता है। मूर्ख सलाहकारों से राहुल गांधी की दशा ‘कोढ़ में खाज’ वाली है। अनुपम खेर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जब राहुल गांधी संसद में कुछ बोलते हैं तो उनके अगल-बगल बैठे उनके सलाहकार उनकी ओर देखते रहते हैं कि जैसा उन्हें सिखाया गया है, वैसा ही बोलें। यह सर्वविदित था कि कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी की तैनाती को चुनौती देने का साहस पार्टी में किसी को नहीं है। इसीलिए लोग अध्यक्ष पद पर उनकी तैनाती को ‘राज्याभिषेक’ कह रहे हैं।

    राहुल गांधी के पार्टी-अध्यक्ष बनने से सबसे अधिक खुश भारतीय जनता पार्टी है। वह मान रही है कि नरेन्द्र मोदी यदि पहाड़ हैं तो उनके सामने राहुल गांधी कंकड़ की तरह हैं। महात्मा गांधी ने आजादी मिलने के बाद कहा था कि अब कांग्रेस पार्टी को भंग कर देना चाहिए। किन्तु जवाहरलाल नेहरू ने उनकी बात नहीं मानी। लोगों का कहना है कि राहुल गांधी जो हैं, उससे यह निश्चित है कि राहुल गांधी जिस प्रकार कांग्रेस पार्टी का उपाध्यक्ष बनने के बाद पार्टी को रसातल की ओर ले जा रहे थे, उसी क्रम में अब वह कांग्रेस का अंतिम संस्कार करेंगे।

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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