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    दुश्मनी ऐसी थी कि मिलने में शर्मिंदगी

    By March 10, 2018Updated:March 10, 2018 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    Post Views: 605

    डॉ दिलीप अग्निहोत्री

    सपा बसपा के बीच हुआ चुनावी समझौता उत्तर प्रदेश की बदली हुई राजनीति का परिणाम है। इन दोनों ने अंततः मान लिया है कि उनका बारी- बारी से सत्ता में आने का दौर समाप्त हो गया है।

    लोकसभा चुनाव के पहले तक उत्तर प्रदेश की राजनीति का अंदाज तामिलनाडु जैसा था। वहां अन्नाद्रमुक और द्रमुक बारी- बारी से सत्ता सुख भोगते थे, उत्तर प्रदेश में ऐसा ही क्रम सपा बसपा का हो गया था। वहां करुणानिधि और जयललिता के बीच केवल राजनीतिक ही नहीं निजी नफरत थी, यही दशा मुलायम सिंह यादव और मायावती के बीच थी। दोनों को एक दूसरे का नाम भी सम्मान के साथ लेना गवारा नहीं था। मिलने का तो कोई सवाल ही नहीं था। मुलायम के उत्तराधिकारी भी इस राजनीति के लाभ जानते थे। इसलिए उन्होंने भी मायावती के प्रति तल्खी कायम रखी।

    पारिवारिक जीवन मे बुआ और बबुआ बड़े प्यारे संबोधन और रिश्ते होते है। बबुआ शब्द वात्सल्य से परिपूर्ण होता है, बुआ माता- पिता की भांति संरक्षण और स्नेह का बोध कराती है । लेकिन मायावती और अखिलेश ने इन रिश्तों को सदैव वीभस्त रूप में ही अभीव्यक्त किया। इसका वात्सल्य, स्नेह, अपनत्व से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था। इन्होंने इन रिश्तों का नाम लेकर एक दूसरे के खिलाफ सदैव जहर ही उगला था। बेहतर यह होता कि ये लोग इन रिश्तों का नाम ही न लेते क्योकि समाज जीवन के लिए यह अच्छा नहीं था। शिखर की नफरत का संचार नीचे तक हो रहा था।

    सपा बसपा के नेताओं की भांति कार्यकर्ता भी एक दूसरे के पारिवारिक या सामाजिक कार्यक्रमों में भी नहीं जाते थे। कल्पना करिए, यदि आज भी प्रदेश में सपा बसपा की राजनीतिक पारी चल रही होती, तब इनके बीच पहले जैसा ही नफरत का आलम होता। इसमें ही दोनो को लाभ भी नजर आ रहा था। इसलिए नफरत की आग जलाए रखने का ही प्रयास चलता रहता लेकिन लोकसभा चुनाव ने प्रादेश की राजनीति में बदलाव की जो इबारत लिखी थी, उसे विधानसभा चुनाव में पक्का कर दिया। प्रदेश की राजनीति सपा बसपा से मुक्त हो चुकी थी। अन्यथा इन पार्टियों के बीच गोरखपुर और फूलपुर में समझौता संभव ही नहीं था। दोनों पार्टियां एक दूसरे पर जो आरोप लगा कर चुनावी बाजी जितने का प्रयास करती थी , वह आज भी लोगों के बीच चर्चित है लेकिन इस समझौते के बाद भी शीर्ष स्तर पर तल्खी कम नहीं हुई है। राज्यसभा चुनाव में एक दूसरे के समर्थन पर सहमति बनी थी,लेकिन एक दूसरे के नामांकन पर मौजूद रहना जरूरी नहीं समझा। इन दोनों पार्टियों में इतनी जम कर दुश्मनी थी कि इन्हें सामने पड़ने पर सदैव शर्मिदगी ही होगी। यही बात इन पार्टियों के मतदाताओं पर लागू होती है।

    मशहूर शायर बशीर बद्र का एक शेर है

    दुश्मनी जम कर करो
    लेकिन ये गुंजाइश रहे,
    जब कभी हम दोस्त हो जाएं
    तो शर्मिंदा न हों ।।

    शायर की ये लाइन किसी अन्य सन्दर्भ में हो सकती है लेकिन सपा बसपा पर सटीक बैठती है। इनके बीच दुश्मनी का यही आलम था। राजनीति में अनेक उतार चढ़ाव होते है। सत्ता मिलती है, चली जाती है। लेकिन कुछ बातें ऐसी होती है, जो आजीवन याद रहती है, इन्हें भूलना भी नहीं चाहिए। मायावती को भी सपा के साथ निजी दुश्मनी याद रखना चाहिए। उमा भारती ने इस संबन्ध में मायावती को मार्मिक पत्र भी लिखा है। उमा भारती ने मायावती को लिखा कि अब ब्रह्नदत्त द्विवेदी जीवित नहीं है।

    इसलिए मायावती उनका फोन नम्बर नोट कर लें। उन पर कोई हमला करेगा, तो वह ब्रह्मदत्त द्विवेदी को भांति बचाव के लिए पहुंच जाएगी। उमा भारती का कथन अर्थपूर्ण है। पच्चीस वर्ष पहले दोनों पार्टियों ने दोस्ती की थी।कुछ समय बाद ही यह दोस्ती दुश्मनी में बदल गई थी। गेस्ट हाउस में मायावती पर जानलेवा हमला हुआ था। उमा भारती का कथन इसी संदर्भ में है। यदि मतभेद राजनीतिक हों तो समझौते या न्यूनतम साझा कार्यक्रम की गुंजाइश रहती है। लेकिन जब नफरत व्यक्तिगत हो जाती है, तब आमने सामने मुलाकात भी मुनासिब नहीं होती। सपा , बसपा आज इसी मुकाम पर है।

    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

    #Bahujan Samajwadi Party #samajwadi party

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