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    नकारात्मक पत्रकारिता ने किया किसानों का अहित

    By August 8, 2018 ब्लॉग No Comments7 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    किसी भी पत्रकार को अपनी निष्पक्षता या महानता के ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता नहीं होती, यह निर्धारण समाज स्वतः ही कर लेता है। इतना तय है कि पूर्वाग्रह से पीड़ित व्यक्ति कभी निष्पक्ष नहीं हो सकता। वह भी एक प्रकार के एजेंडे पर ही चलता है। जिसके प्रति उंसकी कुंठा होती है, उसमें भूल कर भी उसे कोई अच्छाई दिखाई नहीं देती। ऐसे लोग जब किसी न्यूज़ चैनल से हटते या हटाये जाते है, तो उसे भी अपनी महानता और बलिदान के रूप में प्रस्तुत करते है। इनके पास इस बात का जबाब नहीं होता कि छत्तीसगढ़ की किसान महिला से केवल धान से लाभ पर ही सवाल क्यों दागे जा रहे थे, इनके हटने पर कांग्रेस सांसद में व्याकुल क्यों हो गई, इनके बारे में कुछ नेताओं के ऑफ रिकार्ड वार्ता में कौन सी निष्पक्ष मानसिकता थी, ऐसे अनेक सवाल है। किसी पत्रकार को खुद ही यह तय करने का अधिकार नहीं होता कि वह आदर्श गुणों से सम्पन्न है, उसका कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय था, आदि। नकारात्मक पत्रकारिता भी समाज का अहित करती है। छत्तीसगढ़ प्रकरण में यही हुआ। इसमें वैकल्पिक कृषि, समूह कृषि व्यवसाय जैसे मुद्दे चर्चा से बाहर हो गए। जबकि ग्रामीण समाज में यह जानकारी पहुंचनी चाहिए थी।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के किसानों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बात की थी।  कांकेर जिले के कन्हारपुरी गांव की एक महिला चंद्रमणि कौशिक से जब प्रधानमंत्री मोदी ने खेती से होने वाली आय सं बंधी सवाल किए तो उन्होंने कहा था कि पहले के मुकाबले अब उन्हें ज्यादा मुनाफा हो रहा है और उनकी आय दोगुनी हो गई है। यह बात सीताफल पर हुई थी। प्रधानमंत्री ने स्वयं इसके बारे में जानकारी प्राप्त की थी। इस बातचीत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू कथित निष्पक्ष पत्रकारिता की भेंट चढ़ गए। अपने को महान और आदर्श पत्रकार बताने की जिद में सामाजिक दायित्व को पीछे छोड़ दिया गया।
    महत्वपूर्ण यह था कि धान के अलावा स्थानीय स्तर पर फल की खेती भी की जा सकती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस प्रकार की खेती समूह बना कर की जा सकती है। यह माना जा सकता है कि ग्रामीण महिला सही हिसाब नहीं बता सकी। लेकिन गेंहू, धान, आदि की परम्परागत खेती के साथ फल,फूल, आदि की फसल को महत्व देने का विचार देश में जाना चाहिए था। प्रधानमंत्री ने दो हजार बाइस में किसानों की आमदनी दो गुनी करने की बात कही है। फिलहाल पहली बार उपज का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिया गया है। छत्तीसगढ़ की चंद्रमणि ने सीताफल से हो रही दोगुनी आमदनी के बारे में बताया था, वह धान की खेती की खेती से आमदनी बढ़ने की बात नहीं कर रही थी। लेकिन कथित निष्पक्ष पत्रकार की टीम बार- बार धान के ही पीछे क्यों पड़ी थी। मतलब निष्पक्षता के नाम पर एक एजेंडे पर कार्य चल रहा था।
    चंद्रमणि कौशिक ने बताया कि पहले उन्हें सीताफल के जरिए पचास साठ मिलते थे और अब सात सौ का मुनाफा होता है। लेकिन ये मुनाफा उनके अकेले का नहीं है, बल्कि उनके समूह में बारह महिलाएं काम करती हैं और ये मुनाफा सभी बारह लोगों में बंटता है। इसे वह स्प्ष्ट नहीं कर सकी। लेकिन देश में कुछ तो ठीक दिशा में चल रहा है। ऐसे प्रयास पिछली सरकारों को करने चाहिए थे। क्या ऐसे पत्रकार यह चाहते है कि आमदनी दुगनी न हो तो, नए प्रयास करने बन्द कर देने चाहिए।
    कुछ दिन तक ऐसा माहौल बनाया गया जैसे पत्रकारिता पर खतरा आ गया है। महान पत्रकार अपनी बेमिसाल निष्पक्षता के शिकार हुए हुए है। उधर सबसे पहले कांग्रेस परेशान हो गई। लोकसभा में उसके नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इससे आहत दिखाई दिए। कहा कि मोदी सरकार पत्रकारों को दबा रही है। निष्पक्षता के नाम पर भाजपा का विरोध करने वाले पत्रकारों को भी मौका मिला। ये भी आदर्श पत्रकारिता का बखान करने लगे। कहा गया कि नरेंद्र मोदी के बिना उनकी कोई बात पूरी भी कैसे होती।  उनपर नरेंद्र मोदी का नाम न लेने का दबाब बनाया जा रहा था। वस्तुतः पत्रकारों का ऐसा एक वर्ग है जो निष्पक्षता का दावा तो करता है,लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ विरोधियों जैसा एजेंडा लेकर चलता है। ये बताना चाहते है कि देश में जितनीं भी समस्याएं है, वह नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पैदा हुई है। इसके पहले देश समस्या मुक्त था। किसान बहुत खुशहाल थे, उनको पर्याप्त यूरिया,उन्नत बीज, भारी समर्थन मूल्य,सिंचाई और बाजार की सुविधा उपलब्ध थी। अब बन्द हो गई। चार वर्ष पहले बहुत रोजगार थे, अब समाप्त हो गए।
    ऐसे पत्रकारों ने कभी किसी ऐसी महिला से बात नहीं कि होगी, जिसे पहली बार एलपीजी सिलेंडर मिला, किसी ऐसे परिवार से बात नहीं कि होगी जिसे प्रधानमंत्री आवास योजना से अपना घर मिला, मुद्रा योजना से सुविधा प्राप्त करने वालों की खोज में टीम नहीं दौड़ाई गई, बीमा योजना से भी अनेक परिवार लाभान्वित हुए। ये सभी बात प्रधानमंत्री की विभिन्न वीडियो कांफ्रेंसिंग से जाहिर हुई। क्या इसकी तारीफ में दो शब्द कहने से पत्रकारिता की निष्पक्षता समाप्त हो जाती। पहले कितनी सड़क, रेल लाइन बनती थी, अब कितनी बनने लगी, इसकी चर्चा नहीं हुई। अच्छाइयों और कमियों को समान रूप से दिखाना ही निष्पक्षता है। केवल कमियों दुर्गंध की तलाश में भटकना, निष्पक्षता नहीं, पूर्वाग्रह होता है। यह सब भी एक एजेंडे को चलाने जैसा होता है। अपनी बात को बल देने के लिए इनकी टीम भी प्रयास करती है। किसी एक आदमी का बयान दिखाया जाता है कि उद्योगपति के अधिकारी उसे धमका रहे थे। यदि ऐसा है तो मीडिया को भी अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करना चाहिए।
    पीड़ित को न्याय दिलाने की पहल भी करनी चाहिए। वह चाहे तो कमियां बताने के लिए किसी मंत्री का नाम ले सकते है। नरेंद्र मोदी के संबन्ध में इस प्रकार का आरोप गले नहीं उतर सकता। इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछली बार की तरह इस बार भी मोदी के नाम पर चुनाव होंगे। यदि उनके मंत्री पर आरोप है ,तब भी नाम मोदी का ही लिया जाएगा। मोदीं ने आगे बढ़ कर अपनी यह स्थिति स्वीकार की है। यही बात मनमोहन सिंह से उन्हें अलग करती है। मनमोहन इसी से संतुष्ट रहते थे कि उनकी छवि बेदाग है। सरकार दागदार होती रहे उनकी बला से। लेकिन मोदी  अपना  नहीं लेने के बाद भी होने वाले जोखिम को समझते है। ऐसे में इस प्रकार की बातें केवल अपना महत्व दिखाने वाली हो सकती है।
    ऐसे पत्रकारों पर भी गलत तथ्य प्रस्तुत करने के आरोप लगते रहे है। बताया जाता है कि पिछली नौकरी में  एनपीए और किसानों के हालात को लेकर  कई गलत रिपोर्ट दी गई थी। क्या यह सही नहीं कि उनकी  कैमरे पर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के साथ निजी बातें भी चर्चा में आई थी, आपराधिक मामले में एक गिरफ्तारी को भी आपातकाल बताया गया था, केजरीवाल के साथ इंटरव्यू का एक हिस्सा लीक हो गया था, जिसने इनकी सेटिंग और एजेण्डे वाली पत्रकारिता का सच सामने आ गया था।
    गनीमत थी कि पहले यह माना था कि इस वर्ष तक कौशल विकास से दो करोड़ लोगों को ही लाभ मिलेगा। चलिए इसे ही ठीक बता देते । कुछ तो हुआ। लेकिन इसे भी नकारात्मक ढंग से पेश किया गया। वह मानते है कि मोदी सरकार ने अब तक एक सौ छह योजनाओं को लागू किया है। लेकिन इन्हें कभी कोई अच्छाई दिखाई नहीं दी। इनकी कथित निष्पक्षता बेपर्दा हो गई है।

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