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    मर्यादित भाषा से बेपरवाह 

    By November 5, 2018Updated:November 5, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    ऐसा लगता है कि कांग्रेस में ऊपर से नीचे एक जैसा मिजाज है। विपक्षी पार्टी द्वारा आरोप लगाने पर आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन मर्यादा से बिल्कुल बेपरवाह हो जाना गलत है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर भी इस सूची में शुमार हुए।उन्होंने कानून व्यवस्था पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को पत्र लिखा। यहां तक के घटनाक्रम पर आपत्ति नहीं हो सकती। राजभवन में विपक्षी पार्टियों के नेता अक्सर सरकार विरोधी ज्ञापन देने जाते है। राम नाईक इनका स्वागत करते है। लेकिन यह पहली बार है कि राज्यपाल को किसी प्रदेश अध्यक्ष की भाषा पर आपत्ति दर्ज करानी पड़ी। ऐसा लगता है जिसे इस पत्र के माध्यम से राज बब्बर सपा के करीब जाने का प्रयास करना चाहते है। विपक्ष के गठबन्धन में कोई उनका नाम भी नहीं ले रहा है। इसलिए वह सपा से मिलते जुलते आरोप लगा रहे है।
    उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर ने राज्यपाल राम नाईक को पत्र लिखा। इसमें कानून व्यवस्था खराब होने का आरोप लगाया। जाहिर तौर पर यह बात सरकार के संदर्भ में थी। लेकिन इसके बाद राजबब्बर ने सीधे राज्यपाल पर निशाना लगाया। लिखा कि  राज्यपाल की आखिर कैसी मजबूरी है कि वह चुप हैं। राजभवन जीवंत और स्पंदनशील संस्थान है, जिसकी सक्रियता को प्रदेश की जनता ने हमेशा महसूस किया है, लेकिन आजकल राजभवन की वाणी पर विराम को भी महसूस किया जा रहा है।
    बड़े ही बोझिल दिल से आपका ध्यान प्रदेश की दयनीय कानून-व्यवस्था की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। प्रदेश में हत्या, लूट और बलात्कार जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन इन सबसे नागरिकों को सुरक्षित और महफूज करने की बजाए राज्य सरकार मूक दर्शक की भूमिका अख्तियार कर चुकी है। मुख्यमंत्री आरोपियों को  पकड़ने का अल्टीमेटम देते है। फिर भी अपराधी पकड़े नहीं जाते। राज्यपाल ने कांग्रेस अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा है कि मैं अपने विचार सभ्य भाषा में रखता हूं। बब्बर ने पत्र प्रसार माध्यमों को भेजा था इसलिए राम नाईक ने भी इस पत्र की प्रति प्रसार माध्यमों से उपलब्ध करा दी।
    राजनीति में संवैधानिक पदों का सम्मान लोकतंत्र की पहचान होती है। आप की भाषा सर्वथा उचित नहीं है, इसका मुझे खेद है। यह बात बिलकुल सही नहीं है कि मेरी कोई मजबूरी है, मैं चुप हूं या किसी ने राजभवन की वाणी पर विराम नहीं लगाया है। राज्यपाल पद पर मुझे चार वर्ष तीन महीने पूरे हो गए हैं। आप वृत्तपत्र पढ़ते ही होंगे, मेरी वाणी पर कोई विराम देखने के लिए नहीं मिलेगा। यह जरूर है कि मैं राज्यपाल की गरिमा के अनुरूप बोलता हूं। सभ्य भाषा में अपने विचार रखता हूं, न कि आप की शैली में।राज्यपाल ने जवाब में लिखा है कानून व्यवस्था के बारे में आपका लिखा पत्र मैंने तीन बार पढ़ा। इस पर मुख्यमंत्री से चर्चा होती रहती है। सरकार भी संवेदनशील है और निरंतर जागरूकता से काम कर रही है। आपने जो मुद्दे उठाएं हैं, उन पर उचित कदम उठाया जाए इसलिए आपका पत्र मुख्यमंत्री को प्रेषित कर रहा हूं।
    राम नाईक ने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में सदैव मर्यादा का पालन किया। वह अटल बिहारी वाजपेयी के निकट सहयोगी थी। अटल जी तीखे आरोप भी मर्यादित ढंग से लगते थे। राम नाईक का भी यही अंदाज था। राज्यपाल के रूप में उन्होंने विपक्ष के नेताओं को भी पूरा सम्मान दिया, उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया। ऐसे में राज बब्बर ने उनके लिए जिस शब्दावली का प्रयोग किया, उसे उचित नहीं कहा जा सकता। इससे राज बब्बर की छवि पर ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
    Sushil Doshi
     उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर संदेह की गुंजाइश नहीं है। वह भाजपा के शीर्ष राष्ट्रीय नेताओं में शुमार रहे है। लेकिन 2009 के बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से सन्यास लिया, और राज्यपाल बनने के बाद दलगत राजनीति से भी सन्यास ले लिया। राज्यपाल के रूप में उन्होंने संविधान के प्रावधानों के अनुरूप शासन किया। राम नाईक को पहले सपा और उसके बाद भाजपा सरकार के साथ कार्य करने का अवसर मिला। इस पूरी अवधि में उन्होंने संविधान की मर्यादा के अनुरूक सक्रिय राज्यपाल को भूमिका का निर्वाह किया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी वह उचित सलाह देते थे। कानून व्यवस्था में अपेक्षित होने पर ही वह सुधार की संभावना बताते थे। उनकी यह बात प्रायः पत्रकारों के प्रश्न के जबाब में होती थी। इसके अलावा जब उनके पास कोई शिकायत भेजता था तो वह उसे कार्यवाई हेतु मुख्यमंत्री के पास भेज देते थे।
    राम नाईक ने अपनी इस भूमिका में कोई बदलाव नहीं किया है। वह कहते भी है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मेहनत के साथ सुधार करने में लगे है। इसके बाद भी राम नाईक ने पिछले दिनों सरकार को कानून व्यवस्था पर पचहत्तर अंक ही दिए थे। मतलब राम नाईक निष्पक्ष होकर ही कार्य कर रहे है।
    उत्तर प्रदेश का स्थापना दिवस मनाने, स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इस उद्घोष की शताब्दी मनाने का सुझाव राम नाईक ने पिछली सरकार को दिया था। लेकिन इस पर अमल वर्तमान सरकार ने किया। राज बब्बर को यह तथ्य भी देखना चाहिए था।
     राम नाईक ने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में सदैव मर्यादा का पालन किया। वह अटल बिहारी वाजपेयी के निकट सहयोगी थी। अटल जी तीखे आरोप भी मर्यादित ढंग से लगते थे। राम नाईक का भी यही अंदाज था। राज्यपाल के रूप में उन्होंने विपक्ष के नेताओं को भी पूरा सम्मान दिया, उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया। ऐसे में राज बब्बर ने उनके लिए जिस शब्दावली का प्रयोग किया, उसे उचित नहीं कहा जा सकता। इससे राज बब्बर की छवि पर ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

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