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    नया ‘लेफ़्ट’ और पुराना ‘राइट’ दोनों एक ही जगह हैं: मनोहर श्याम जोशी

    By August 10, 2017 ब्लॉग No Comments14 Mins Read
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    दयानंद पांडेय  

    हिंदी लेखकों में सफ़लतम माने जाने वाले मनोहर श्याम जोशी इन दिनों उत्साह और अवसाद के बीच झूल रहे हैं। ऐसा वह मानते हैं। भाषा से बेतरह खेलने वाले और मस्त तबीयत के मनोहर श्याम जोशी अब मानते हैं कि वह बुढ़ा रहे हैं और उनका ‘जोशियम्स’ पिटी हुई हालत में है। कुरू कुरू स्वाहा, कसप, हरिया हरक्यूलिस जैसे उपन्यासों तथा हम लोग, बुनियाद, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, नेता जी कहिन और गाथा जैसे टी.वी धारावाहिकों के ज़रिए दृश्य माध्यम के लेखन में महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाले मनोहर श्याम जोशी की चिंताएं कई हैं। कुछ समय पहले कथाक्रम की गोष्ठी में हिस्सा लेने वह लखनऊ आए उस समय राष्ट्रीय सहारा के लिए दयानंद पांडेय ने उनसे ख़ास बातचीत की थी जिसके प्रमुख अंश यहां पेश हैं:
     
    आपकी पहली चिंता क्या है?
    – इस समय हमने जो भी कुछ लिखा है। उससे संतोष नहीं है। मरने के पहले संतोष वाला कुछ लिखना चाहता हूं। दूसरे जिन चीजों को ले कर निकले थे वह तो हुआ नहीं इस सदी में। अगली सदी में क्या होगा हमें समझ नहीं आता। अभी तो कंप्यूटर-इंटरनेट की दुनिया ही समझ में नहीं आती। तीसरे नैतिकता के बारे में बड़ी चिंता है जिसको भी मानवीय वगैरह कहते हैं। इस समय विज्ञान, मंडी सब नीति निरपेक्ष हैं। तो फिर बचता क्या है? चौथे जो नीति है उसको हम पहले जानते हैं कि सब कुछ पारस्परिकता पर संभव होती है। बदतमीजी करके आहत करते हैं या दूसरे का ख़याल रखते हैं। हम ऐसे समय में जी रहे हैं कि पड़ोसी अजनबी है और वह टीवी में अपना नज़र आता है। ऐसी सदी में जी रहे हैं जिसमें अद्भुत यह है कि आदमी का कोई घर नहीं है और हर जगह घर है। होटल ही घर है। सैलानी हो गए हैं। सारी दुनिया आपकी है और नहीं है। जैसे कि हम सारी दुनियां घूमे हैं पर हम पहाड़ी हैं, कुमाऊंनी हैं और ब्राह्मण हैं। अभी यहां विद्वता बघार रहे हैं पर अभी अपने रिश्तेदार के यहां जाएंगे तो वहां लोग पूछेंगे कि हेमामालिनी कैसी हैं? हिंदुस्तान में सभी पंजाबी हिंदी बोलते हैं, पंजाबी खाना खाते हैं पर जो ज़्यादा संपन्न हैं वह अमरीकी बोली बोलते हैं, अमरीकी खाना खाते हैं। हो सकता है जो तार से बंधे मानव हैं और सिलिकान हैं उसके सामने आप कुछ न रह जाएं। कंप्यूटर अगर एक दिन भी फेल हो जाए तो? उठा पटक व भाग दौड़ बहुत है। मेरा उपन्यास कपीश जी इसी लिए पूरा नहीं हो पा रहा है। घरेलू चिंता भी है कि दो बेटों की शादी हो जाएगी कि नहीं?
    आपके वार एंड पीस लिखने की तमन्ना का क्या हुआ?
    – अभी तो कपीश जी पूरा करना चाहता हूं। पूर्व बनाम पश्चिम की भिड़ंत है। हनुमान जी स्वप्न में दर्शन देते हैं। स्वप्न में एक दाढ़ी वाले से मिलाते हैं। चित्र अब्राहम लिंकन का है…। एक अमरीकी महिला के संपर्क में आते हैं जो ट्रेड यूनियनिस्ट और इंडस्ट्रीयलिस्ट की औलाद है। अंत में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो जाती है। तो यहां भारत की भी सात पीढ़ी और अमरीका की सात पीढ़ी की किस्सागोई हैं कपीश जी। यहां की सात पीढ़ी लिख चुका हूं पर अमरीका की सात पीढ़ी लिखने में कष्ट में पड़ा हूं। क्यों कि हमारे यहां डेमोक्रेसी लूटने के लिए बड़ी सीमित है। सारा तो कांग्रेस ने लूट लिया है। पर वहां लूट का आरपार नहीं है। रेड इंडियंस, राईन ऑफ़ कैपटलिज्म…।
    अमूमन आप जितना पढ़े-लिखे लोग या तो दार्शनिक हो जाते हैं या विचारक बन कर प्रवचन देने लगते हैं पर आप फिर भी किस्सागोई किए जा रहे हैं? ऊब नहीं होती?
    – किस्सागोई कुमायूं की परंपरा है। फसक फराल लोग किस्सा सुनाने में एक्सपर्ट होते हैं। तो किस्सागोई तो हमारे खून में है।
    आपने अभी सात पीढ़ियों की कथा की बात की। अमृतलाल नागर ने भी अपने अंतिम उपन्यास करवट में तीन पीढ़ियों की कथा परोसी है कहीं यहीं से तो नहीं इनस्पायर हुए कपीश जी के लिए?
    – कुरू कुरू स्वाहा जब आया तो नागर जी ने कहा कि तुमने क्या लिखा है यह तिहरा चरित्र! मेरा खंजन नयन आने दो तब देखना! सूरदास को कैसे ट्रीट किया है। नागर जी का मैं शिष्य हूं। नागर जी को बड़ा काम्प्लेक्स था कि लोग उन्हें घटिया लेखक समझते थे। कहते थे कि एक व्यंग्य लिख लेता है, भाषा से खेलता है। मुझे भी लोग कहते हैं। मैं पूछता हूं क्यों न भाषा से खेलें? आपको भी भाषा से खेलने आए तो खेलिए! लेकिन नागर जी ऐसा जवाब नहीं दे पाए। तो फ़िल्में छोड़ कर लखनऊ आ गए और लिखा बूंद और समुद्र! फिर तो वह अच्छे लेखक मान लिए गए। हालां कि मैं पाता हूं कि बाद में उन्होंने बहुत गड़बड़ किया।
    बात आपकी विद्वता की चली थी?
    – मैं तो विद्वान नहीं। मेरी विद्वता पत्रकारिता के स्तर की है। थोड़ा यह भी सूंघ लिया, थोड़ा वह भी सूंघ लिया। पत्रकारिता के स्तर का ज्ञान है। जो विद्वान है भी आधुनिक साहित्यकारों में तो अर्जेंटीना के लेखक मारखेज़थे। मारखेज़ सारे साहित्यिक आंदोलनों में हिस्सा लेने के बाद लेखन में लौटे थे। कुरू कुरू स्वाहा मैंने उन्हीं से प्रेरणा ले कर लिखी थी। हुआ यह कि मेरे मित्र श्रीकांत वर्मा जब साधन संपन्न हो गए तो उनको अधिक से अधिक किताबें मंगाने का शौक हो गया। तो दिखाने लगे कि निर्मल वर्मा से ज़्यादा किताबें वह मंगाने, वह पढ़ने लगे हैं। तो उन्हीं के यहां से मैंने मारखेज़ की किताब ली और कुरू कुरू स्वाहा लिखने की प्रेरणा मिली।
    जोशियम्स अब कहां है?
    – जोशियम्स नाम से तो मैं लिखता था।
    पर मैं कुरू कुरू स्वाहा के जोशियम्स की बात कर रहा हूं। उस तिहरे चरित्र को मिला कर एक जोशियम्स की बात कर रहा हूं कि जोशियम्स अब कहां हैं?
    – अच्छा अच्छा! जोशियम्स अब बिचारे पिटी हुई हालत में हैं। जैसा कि उस उपन्यास में है। उसमें अवसाद का ज़िक्र हैं मेरा व्यक्तित्व भी भयंकर अवसादपूर्ण है। डिप्रेशन बढ़ता जा रहा है।
    पर हम लोग तो आप की सफ़लता और चमक से रश्क करते हैं!
    – ऐसा होता है। पर लेखक और ज़्यादातर कलाकार जो इस दुनिया में हैं वे उत्साह और अवसाद के बीच झूलते हैं। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है अवसाद बढ़ता जाता है। बुढ़ापे की निशानी है कि अख़बार पढ़ते हैं और गाली देते जाते हैं। मियां बीवी अकेले हैं तो यही करते हैं। जोशियम्स का नैराश्य बढ़ता जाता है। कुरू कुरू में यह स्पष्ट है कि वयस्क से जो जोशी हैं, सबसे पिटे हुए मोहरे हैं। बालक बड़ा प्रबल है। उम्र बढ़ती है तो बालक प्रबल होने लगता है। मैं इतना पिट गया कि मेरे बेटों ने भी मुहावरा अपना लिया कि पिट गए! यह मेरी अपरिपक्वता है। मेरा खिलंदड़पना है। मैं वयस्क होता तो निर्मल वर्मा की तरह बोलता, लिखता! जोशियम्स का मृत्यु भय बढ़ता जाता है। लगता है यह तो किया नहीं, वह तो किया नहीं। अफ़सोस भी बढ़ता है कि हम ऐसे क्यों न हुए!
    और कुरू कुरू की ‘पहुंचेली’ कैसी है?
    – पहुंचेली तो ‘प्रतिबद्धता’ का ही प्रतीक है! हँसते हैं भाषा खुद भी मनुष्य को निर्धारित कर देती है। उसमें अपने व्यक्तित्व का विरोधाभास भी है।
    और ‘कसप’ के देबिया टैक्सी का क्या हाल है?
    – अमरीका चला गया। पिट गया वह भी।
    और शास्त्री जी?
    – शास्त्री जी विचार सुन रहे हैं। ब्रह्मांडव्यापी तार सुन रहे हैं।
    और उनकी नायिका बेटी बेबी?
    – इस समय बड़े भारी परफारमेंस सेंटर की डायरेक्टर हैं!
    और दया बहन?
    – वह प्रगतिशील लेखिका हो गई हैं।
    कैंजा?
    – बेचारी मर गई होगी।
    और देबिया का चरसी दोस्त?
    – रियल नाम ललित है। बहुत ही मामूली नौकरी करता है। संकट में है। बच्चे भी कलाकार हैं। उसी की तरह उसके बच्चे भी असफल हैं। आज भी होली गाता है। दरअसल लेखक भी बड़ा निर्मम होता है। बाद में अपने चरित्रों को भूल जाता है।
    कुरू कुरू वाली गुलनार की याद है?
    – मीरा नायर को ले कर ‘कुछ’ कर रही होगी। हँसते हुए। दरअसल एक बार लिखने के बाद मैं दुबारा पढ़ता नहीं हूं।
    जब आप साप्ताहिक हिंदुस्तान में संपादक थे तब अकसर आंखें बंद कर के बात करते थे। अब देख रहा हूं आज आंखें खोल कर बात कर रहे हैं?
    – क्या होता है कि आदमी बहुत ही कंप्यूटरनुमा चीज़ है। जो भाषा संस्कार डाल दिए जाते हैं इनसे ही फ़र्क पड़ जाता है कि माता-पिता कैसे उठते बैठते हैं उसका भी फ़र्क पड़ता है। मैं अपने बेटे की बात करूं जब बड़ा हो कर वह मेरी तरह पिट गए! जैसे बातें करने से लगा या और भी तमाम बातें मेरी तरह करने लगा तो मुझे अपने को बदलना पड़ा। नागर जी और अज्ञेय जी भी मेरे पिता तुल्य ही हुए तो मुझे याद आता है कि यह आंख बंद करने वाला अंदाज अज्ञेय जी का था। कभी-कभी नागर जी भी ऐसा करते थे। तो मेरे व्यवहार में भी यह बात आ गई।
    कहा जाता है कि बहुत सारी सुंदर महिलाएं आपके इस आंख बंद कर बतियाने के अंदाज से नाराज हो गईं?
    – हां ऐसी बात बहुत लोगों ने कही! हँसते हैं।
    तो आंखें खुलीं कैसे?
    – साप्ताहिक हिंदुस्तान की संपादकी से हटते ही आंखें खुल गईं!
    इन दिनों लेखकों के कई खाने बन गए हैं?
    – अगर आप यह कहते हैं कि फार्मूले के हिसाब से लिखते हैं तो सही है, नहीं ग़लत है तो आप अपने पास रखिए अपना फार्मूला। आप नान लेखक मुझे मानिए मुझे खुशी होगी। अगर मांग कम्युनिस्ट होना है तो मत पढ़िए मुझे। मैं भी पचासियों को नहीं पढ़ता। मैं आपसे एक क्षण के लिए भी नहीं कहता कि आप मेरी बात मानिए। संकट यह है कि नया लेफ्ट और पुराना राइट दोनों एक ही जगह पर हैं। आज कई जगह हो रहा है कि भाजपा और माकपा की स्थापनाएं एक हैं। अमरीका के खि़लाफ़ हो चाहे सीटीबीटी के खि़लाफ़। लेखक कहे कि मैं प्रगतिशील हूं, मेरा डायलाग नं. 400 देख लो। यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। सिर्फ़ शब्दों से प्रतिबद्धता जाहिर होती हो लेखक की तो ऐसा भी नहीं है। न मैं महाश्वेता देवी की तरह फ़ील्ड में जा कर लिख रहा हूं न प्रेम कुमार मणि की तरह दलित परिवार में पैदा हुआ हूं। मैं तो ब्राह्मण हूं, पत्रकार हूं। सी.पी.एम. का भी शासन हो तो भी जीवन मूल्य मंडी वाले हैं। जीवन की श्रेष्ठता और श्रेष्ठता के सारे मानक सामंती हैं। सारे संसार का अमरीकीकरण हो रहा है। पर दिक्क़त यह है कि संस्कृति की सीता की बिना वर्जनाओं के रक्षा नहीं हो सकती। अगर मेरे साहित्य में दलित सरोकार नहीं है तो यह हमारी खामी नहीं है। मेरी तबीयत होगी तो ज़रूर लिखूंगा। ऐसा नहीं कि नहीं लिख सकता। बाएं हाथ से लिखता हूं। यह कोई बड़बोलापन नहीं है।
    कई लोग आप को सफल उपन्यासकार मानते हैं और कई लोग सफल धारावाहिक लेखक। पर आप अपने को कहां पाते हैं?
    – मैं तो प्रिंट मीडिया का आदमी हूं।
    पर पत्रकारिता छोड़े तो आपको एक दशक से ज़्यादा हो गया?
    – उपन्यास तो लिख रहा हूं। पत्रकारिता में भी कई आफर आए पर मैं गया नहीं। उपन्यास ही लिख रहा हूं। आने वाला समय प्रिंट मीडिया का है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो पिट गया है। पर प्रिंट मीडिया भी अब इंटरनेट पर जा रहा है। इस वक्त किताबों की सबसे बड़ी लाइब्रेरी इंटरनेट पर ही है न.
    (नवम्बर १९९७ में लिया गया इन्टरव्यू)

    मनोहर श्याम जोशी

    09 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की ख़ातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गए। अमृत लाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्ष से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गए।
    प्रेस, रेडियो, टी. वी., वृत्तचित्र, फ़िल्म, विज्ञापन-संप्रेषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफ़लता पूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से ले कर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएं पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति तब प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्ष के होने आए।
    केंद्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक बने और वहीं एक अंगरेज़ी साप्ताहिक का भी संपादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में संपादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।
    खैर तो साहब, जोशी जी लेखक-वेखक बन गए। गोष्ठियों में जाने लगे। कॉफ़ी हाउस में कॉफ़ी पिलाने वालों की संगत करने लगे। लेखक बनने के लिए तब का लखनऊ एक आदर्श नगर था। यशपाल, भगवती बाबू और नागर जी ये तीन-तीन उपन्यासकार वहां रहा करते थे। तीनों से जोशी जी का अच्छा परिचय हो सका। शुरू में यशपाल उनके अच्छे पड़ोसी रहे थे और इन तीनों में यशपाल ही प्रगतिशीलों के सबसे निकट थे। इसके बावजूद यशपाल से ही जोशी जी का सब से कम परिचय हो पाया। यशपाल उन्हें थोड़े औपचारिक-से, शुष्क-से और साहिबनुमा-से लगे। इसकी एक वजह शायद यशपाल जी की रोबीली और कुछ घिसी-घिसी-सी आवाज़ रही हो। यशपाल जी ने भी उन्हें कभी खास ‘लिफ़्ट’ नहीं दी। यशपाल जी से कहीं ज़्यादा निकटता जोशी जी ने उनकी पत्नी और उनकी बेटी मंटा से अनुभव की। अल्हड़ मंटा लखनऊ लेखक संघ के सभी सदस्यों को बहुत प्यारी लगती थी, रघुवीर सहाय ने तो उस पर कभी कुछ लिखा भी था।
    भगवती बाबू से जोशी जी की बहुत अच्छी छनी। बावजूद इसके कि तब भगवती बाबू कांग्रेसी थे और उस दौर के कम्युनिस्टों के लिए कांग्रेस ‘समाजवादी’ नहीं, किसानों-मजदूरों का दमन करने वाली पार्टी थी। भगवती बाबू से जोशी जी की अच्छी छनने का सबसे बड़ा कारण यह था कि वह नई पीढ़ी के लेखकों से मित्रवत् व्यवहार करते थे। उन्हें ‘अमां-यार’ कह कर संबोधित करते थे और उनके साथ बैठ कर खाने-पीने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। खूब हंसते-हंसाते थे। हंसते इतने ज़्यादा थे कि उनकी आंखों में पानी भर आता था। हंसने से बाहर आते पान के मलीदे को उन्हें बार-बार ओठों से भीतर समेटना पड़ता और कभी-कभी अपने या सामने वाले के कपड़े रूमाल से पोंछने पड़ जाते। हंसते-हंसाते नागर जी भी बहुत थे लेकिन नए लेखकों के साथ उनका व्यवहार चचा-ए-बुजुर्गवार का ही होता था, भगवती बाबू की तरह चचा-ए-यारवाला नहीं। गप्प-गपाष्टक का शौक भगवती बाबू को नागर जी के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा था। अफ़सोस कि इतने भले और दोस्ताना भगवती बाबू को भी जोशी जी ने व्यंग्य-बाणों का पात्र बनाया।
    हुआ यह कि भगवती बाबू ने ‘उत्तरा’ नाम से एक पत्रिका निकाली। इसमें सहायक संपादक पद्मकांत त्रिपाठी थे, जिनका तेवर दूसरों के प्रति सदा व्यंग्य-विद्रूप-भरा रहा करता था। वह पत्रकार थे और भुवनेश्वर के निकट होने के कारण अपने को उनका उत्तराधिकारी भी समझते थे। भुवनेश्वर की तरह ही वह बर्नाड शॉ-वाले अंदाज में चुटीली मगर चुभनेवाली बातें किया करते थे। बाद में उन्होंने भुवनेश्वर की शैली में अपना इकलौता एकांकी, ‘लघुकेशिनी तिरळवल्लमिदम्’ भी लिखा जो निहायत धांसू किस्म का था। लिहाजा तमाम तरह की अटकलों का विषय बना। खैर, तो जोशी जी ने ‘उत्तरा’ के लिए दो कहानियां लिखीं और उनके पारिश्रमिक के विषय में कई बार पद्मकांत त्रिपाठी को याद दिलवाया। पद्मकांत जी ने एक दिन जोशी जी की इस विह्वलता का थोड़ा लुत्फ़ ले लिया। उन दिनों जोशी जी अस्वस्थ थे और उनके पास दवा खरीदने का पैसा नहीं था। तो उन्होंने किसी से एक पोस्टकार्ड मांगा और उसमें गांधीवादी भगवती बाबू को व्यंग्यात्मक चिट्ठी लिखी कि आप पीड़-पराई जानने वाले नहीं, दूसरों की पीड़ा को पीड़ा पहुंचाने वाले गांधीवादी हैं। हिमाकत यह है कि जोशी जी ने वह कार्ड आकाशवाणी के पते पर भेज दिया, जहां उन दिनों भगवती बाबू हिंदी सलाहकार नियुक्त कर दिए गए थे।
    (राज कमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित संस्मरणात्मक पुस्तक “लखनऊ मेरा लखनऊ” से साभार।)
    -सरोकारनामा से साभार

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