सच तो यह है कि इस सृष्टि में कुछ समय तक हर कोई मानसिक और शारीरिक रूप से ताकतवर होता है लेकिन वही किसी समय बेहद विवश और कमजोर भी होता है। बस प्रत्येक इंसान के लिए यही बात समझने की है, आज इसी बात को नहीं समझा जा रहा है। जब शिशु जन्म लेता है तो वह बेहद पराश्रित होता है, वह एकदम विवश होता है, उसका लालन-पालन सहित सब कुछ उसके माता-पिता के जिम्मे होता है। बच्चा भी अपने माता-पिता की हां में हां करता रहता है। जैसे-जैसे उसमें शारीरिक शक्ति, चेतना और समझ विकसित होने लगती है, वैसे-वैसे उसकी विवशता कम होने लगती है।
बहुत सारे माता-पिता इस छोटी उम्र को, विवशता को देखकर बच्चों को जाने-अनजाने में डांटते रहते हैं, शारीरिक रूप से दण्डित करते रहते हैं, मानसिक रूप से भी प्रताडि़त कर देते हैं। बच्चे अपने माता-पिता को सक्षम देखकर, ताकतवर देखकर ऊपर-ऊपर से चुप हो जाते हैं। इस प्रकार के वातावरण से जहां उसमें नफरत, कुंठा, क्रोध-प्रतिशोध और उपेक्षा के भाव जन्म लेते हैं वहीं उनके मन-मस्तिष्क से प्रेम, दया, सहयोग, सम्मान और हिम्मत के भाव नदारद होने लगते हैं। ऐसा वातावरण आगे जाकर ऐसे माता-पिता के लिए परेशानियों का सबब बन जाता है।
दूसरी तरफ जब माता-पिता एक समय ऐसी स्थिति में पहुंचते हैं जब वे एकदम विवश, कमजोर और पराश्रित हो जाते हैं और उनके बच्चे एकदम ताकतवर, सक्षम और मनमर्जी के मालिक होते हैं। यहां बड़ा यक्ष प्रश्न उपस्थित होता है और यह एक प्राकृतिक प्रश्न या नियम भी है कि जो जैसा देता है उसे वैसा ही मिलता है, जो जैसा बोता है वह वैसा ही काटता है। जब माता-पिता सक्षम होते हैं तो उस सक्षमता को समझाने की बेहद जरूरत होती है, उसके सदुपयोग की जरूरत होती है और उसको अच्छी तरह काम में लेने की जरूरत होती है।
बहुत जगह ऐसा होता भी है और नहीं भी होता है। बच्चे भी अपनी शक्ति का सदुपयोग करें, अपने विवश माता-पिता का सहारा बनें, प्यारा बनें, उन्हें समय दें, उनसे बतलाएं, उनके अनुभव शेयर करें और उनको पूरे सम्मान के साथ रखें, तथा दूसरी तरफ माता-पिता भी अपने छोटे-छोटे मासूमों को प्यार दें-संस्कार दें, जीवन का सार दें और सबसे बड़ी बात उन्हें समय दें, उनके साथ बच्चे बनें, बस यही मानवीय और पारिवारिक सार-आधार है।
माता-पिता और बच्चे आपस में एक-दूजे के सहारे हैं।
आदर प्रेम के जीवन से ही वे एक-दूजे के लिए प्यारे हैं।।







