अंशुमाली रस्तोगी
मेरे कने करने को कुछ नहीं सिवाय ‘इम्युनिटी’ बढ़ाने के। कभी लिखकर, कभी गरियाकर, कभी ताड़कर, कभी छेड़कर, कभी सांस भीतर-बाहर खेंचकर अपने ‘इम्यून सिस्टम’ को मजबूत करने में लगा रहता हूं। सुना है, जिनका इम्यून लोहा है, उन्हें कोरोना छू भी नहीं सकता।
इम्युनिटी की बाजार में इन दिनों खूब डिमांड है। जिगर चाहे मजबूत न हो पर लोग इम्युनिटी मजबूत करने में जी-जान से लगे पड़े हैं। वायरस का भय उनसे वो सबकुछ करवा रहा है, जिसकी कल्पना उनने कभी की भी न होगी। हर चेहरा मास्क से ढंका और हाथ ग्लब्स में बंधे नजर आते हैं। बात करते हैं तो उचित दूरी बनाकर रखते हैं। हाथों को इस हद तक सेनिटाइज करते हैं कि उफ्फ। हर चीज पर संशय, हर किसी पर शक। गलती से कोई किसी से छू या टकरा जाए तो सॉरी निकलने के बजाए एक-दूसरे पर आंखें तान लेते हैं।
घर में अगर चार सदस्य हैं तो चारों डॉक्टर मिलेंगे। हर किसी के पास कोरोना का इलाज है, हर किसी के पास इम्युनिटी बढ़ाने का अचूक नुस्खा है। लॉकडाउन में देश में इतने डॉक्टर्स बढ़ गए हैं, इतने को सालभर में न बन पाते। कोई काढ़ा पिलवा रहा है तो कोई लहसुन खिलवा रहा है। कोई कह रहा है, प्रभु की भक्ति में लीन रहो। सारे कष्ट निपट जाएंगे। कोरोना काल के बीतते ही धरती फिर से स्वर्ग-सी नजर आएगी।
मैं सबकी लीलाएं देख रहा हूं, सबकी राय सुन रहा हूं। इसके अतिरिक्त कुछ कर भी तो नहीं सकता। यह किसी से नहीं कहता कि तुम गलत हो। गलत को गलत कहना मैंने आजकल बंद किया हुआ है। क्या फायदा किसी को गलत कह उसकी इम्युनिटी घटाने से।
इम्युनिटी का ही तो सारा खेल है। जो इस खेल को खेल गया, समझो वो जिंदगी जीत गया। जो हार गया समझो खर्च हो गया। अतः अपनी इम्युनिटी को बनाए-बचाए रखें। जिस कांड को करने से इम्युनिटी बढ़ती है, उसे अवश्य करें। अफवाहों पर कान न दें, नहीं तो रही-सही इम्युनिटी से भी हाथ धो बैठेंगे। क्या समझे! -चिकोटी से







