प्रख्यात लेखिका एवं कवयित्री/शायरा आशा शैली की गजलों का यह संग्रह रेगिस्तान में वर्षा की फुहार है तो पहाड़ों में बसंत की बहार है, पतझड़ में खिलखिलाती नर्गिस है तो जीवन में आशा का संचार है, यहाँ जीवन के विविध रंग है, बड़ा कैनवास है और देखने के लिए विस्तृत नजरिया भी है, आइये गुनगुनाते हैं –

“खुशबु-ए-गुल की तरह मैं भी बिखरकर देखूँ ,
ख़्वाब में साथ तेरे आज सफ़र कर देखूँ ”
“देखकर जंगली गुलाबों को,
कितने बाग़ों ने खुदकुशी की है
वो मेरा हमसफ़र हुआ जब से,
मैंने खुद से भी दोस्ती की है “







