अंशुमाली रस्तोगी
डीजल पेट्रोल से बीस हो लिया है। अब तक उन्नीस बने रहना उसकी तौहीन थी। मैं खुश हूं। ‘अच्छे और उजले दिन’ साथ-साथ आए हैं। वाकई सरकार काम कर रही है। जिस सरकार में पेट्रोल-डीजल के भाव सातवें आसमान पर पहुंच जाएं, समझ लीजिए उसमें ‘राष्ट्रीय-हित की भावना’ कूट-कूट कर भरी है। हमारा सौभाग्य, हमारे पास ऐसी ही सरकार है!
कोरोना के साए से निकलकर लोगों का ध्यान किसी अन्य मुद्दे पर केंद्रित तो हुआ, यह अच्छी बात है। वरना तो चौबीस घंटे कोरोना पर चर्चा होती रहती थी। अब लोग थोड़ा-बहुत पेट्रोल-डीजल के बढ़ते भाव पर बोल रहे हैं। चिंता जता रहे हैं कि इससे महंगाई बढ़ेगी। कच्चा तेल जब कौड़ियों के भाव आ गया है, ऐसे में पेट्रोल-डीजल में वृद्धि, बात समझ से परे है।
लोग भी अजीब हैं। जब देखो तब किसी न किसी मुद्दे पर चिंता जताते रहते हैं। अभी तक कोरोना की चिंता में घुले जा रहे थे, अब तेल के बढ़ते दाम में दुबले हुए जा रहे हैं। ये भी कोई बात हुई भला!
‘देश-हित’ व ‘जन-हित’ के वास्ते ‘कुछ पैसे’ जेब से निकालने में लोगों की नानी मरती है। सरकार ने दाम अपने लिए थोड़े न बढ़ाए हैं। यह भी देश-हित का ही काम है। जनता से लिया जनता को ही वापस। सरकार जनता से लेकर एक रुपया तक अपनी जेब में न रखती। सब जन-योजनाओं में लगा देती है। गरीबों, बेरोजगारों, मजदूरों का कल्याण करती है। इतने-इतने लाख करोड़ की योजनाएं हवा में थोड़े न बन जाती हैं। सबके लिए धन चाहिए होता है। और धन जनता से टैक्स के रूप में आता है। सिंपल।
एक हम हैं जो सरकार पर यह इल्जाम धर देते हैं कि वो महंगाई बढ़ा रही है। सरकार भला क्यों महंगाई बढ़ाएगी! महंगाई तो अपने आप बढ़ती-घटती है। इसमें सरकार का कोई ‘रोल’ नहीं।
अस्सी रुपए तेल अगर हो भी गया तो कौन-सा पहाड़ टूट गया! इससे कहीं ज्यादा की तो हम सिगरेट-बीड़ी में ही फूंक देते होंगे।
भई, थोड़ा संतुलन बनाना सीखिए। सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलिए। फिर आपको न तेल के दाम बढ़े दिखेंगे न महंगाई। कुछ अंतरराष्ट्रीय दबाव भी तो होते हैं न। समझ रहे हैं!







