भादों के सजनी बदरा घिर आए
खिड़की से झांकें बरखा की बूँदें
मन कहता इनको गंगाजल कर लें
गये चैत में पिया लौट नहीं आए
बैसाखी के मेले सूने बीते
पिया बिना सजनी मन के रस फीके
सावन के घन जिया नहीं हुलसाये
झूले कहाँ पड़ें अब अमराई में
गइया नहीं रंभाये अंगनाई में
बौराया मन अधिक अधिक बौराये
- आशा शैली







