लेटा हूं हरे बांस पर,
सांस हो गयी है गायब।
जो कल तक रहते साथ,
आज वहीं हमें फेंक रहे हैं शायद।।
हम देख तो सकते नहीं,
लेकिन एहसास हो रहा है।
आंसू बहा रहे हैं सभी अपने,
लेकिन कोई हमें घर में रहने नहीं दे रहा है।
कितनी मतलबी है यह दुनिया,
जब तक सांस थी सबको हमसे आस थी,
आज सांस के जाते ही,
हमें बिना बिस्तर के बांस पर लेटाए जा रहे हैं।।
देखते ही देखते सजा रहे जलावन,
उस पर लेटाकर हमें जलाए जा रहे हैं।
एक टुकड़ा बचा है शरीर का हमारे,
मैं सोच रहा हूं कह दूं, इसे तो छोड़ दो प्यारे
लेकिन कौन है सुनने वाला,
धन्य है हम, पड़ गये हैं किसके पाला।
जो हमसे करते थे प्यार,
वहीं बांस से हमें मार रहे हैं।
एक भी टुकड़ा न बचे,
इस कारण आग को और धधका रहे हैं।
जिंदगी की यही सच्चाई,
लेकिन हम कहां इसे मान रहे हैं।
हम तो यही मानकर चलते हैं कि
हम अमर रहने आये हैं यहां।
जो पाओ लूट लो उसको,
कल को वह मिलेगा कहां।।
जिसके लिए लूटा था हमने,
वही तो हमें आज दूर भगा रहा है।
एक पल भी घर में रखने को नहीं तैयार,
भले ही स्वार्थ में वह आंसू बहा रहा है।।
- उपेंद्र नाथ राय ‘घुमन्तु’







