राहुल कुमार गुप्त
हल को अब हथियार बना लो।
अपने वतन को फिर से बचा लो।
इस बंजर सत्ता के सीने में।
अपने हक का पौध खिला दो।।
जनता बेसुध कल पड़ी थी,
जनता बेसुध आज पड़ी है।
इनसे न कोई उम्मीद लगाओ।।
खुद ही भगत, आज़ाद बनो अब।
इंकलाब की मशाल जला लो।।
आपस में हम सबको लड़ा के।
यह सत्ता करती राज यहां पे।।
सिर पे अब सब बांध कफ़न लो।
इन ठगों की ईंट से ईंट बजा दो।।
हल को अब हथियार बना लो।
अपने वतन को फिर से बचा लो।।
इस बंजर सत्ता के सीने में।
अपने हक का पौध खिला दो।।
कलम यहां तो बिक चुकी हैं।
अब न क्रांति उससे आयेगी।।
जनता बेसुध कल पड़ी थी,
जनता बेसुध आज पड़ी है।
इनसे न कोई उम्मीद लगाओ।।
जवान तो करता सीमा रखवाली।
अंदर कौन संभाले जिम्मेदारी??
कब तक कोई शोषित होगा??
देखो! चहुंओर फूट पड़ी चिंगारी।।
हल को अब हथियार बना लो।
अपने वतन को फिर से बचा लो।।
इस बंजर सत्ता के सीने में।
अपने हक का पौध खिला दो।।







