सतुआ-पिसान उधियाइल हो, हम केइसे मनाई सतुआन।
जौ खेतवा में ना बोआइल हो, हम केइसे मनाईं सतुआन।।
चनवा के खा गईलस ढेलुअवा हो, हम केइसे मनाई सतुआन।।
गउवों ना कहीं लउके ला भरसाई हो,
टिकोरा त बा आम पर बाटे लेकिन,
उखिया क पतिया का ना लउके परिछाई हो।
हम केइसे मनाई सतुआन।
सुबहिए अखियां खुलते पहिले त नहाई
फिर गुर सातू अउरी सतुआ छुआई।
पंडी जी के अलगे से सब कुछ रखाई,
तब जाके पेट के खातिर कुछ आई।
अबहूं चलत बा कुछ गांव में लेकिन
बस सब केहू औपचारिकता के निबाहीं हो, हम केइसे मनाई सतुआन।।
– उपेंद्र राय ‘घुमन्तु’







