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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    आखिर क्यों टूटती जा रही बसपा ?

    ShagunBy ShagunJune 16, 2021 Current Issues No Comments10 Mins Read
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    Post Views: 679

    चित्रगुप्त

    बसपा में लगातार विकेटों का गिरना जारी है कोई भाजपा का तो समाजवादी पार्टी का दामन थाम रहा है आज मंगलवार को फिर बीएसपी के नौ नेता गुपचुप तरीके से सपा मुखिया से मिले। उधर बसपा सुप्रीमों निश्चिंत हैं कि पार्टी में अब सब ठीक है। आपको याद होगा कि ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ ये नारा दलितों के हित की बात करने वाले बसपा संस्थापक कांशीराम (दिवंगत) के दिल से निकला, जिसे आवाज दी मायावती ने। इसी नारे ने बसपा को उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर पैर जमाने का मौका दिया। इसके बाद बसपा किसी पहचान की मोहताज नहीं रही।

    कांशीराम के दिवंगत होने के बाद इस पार्टी को सिर्फ और सिर्फ मायावती के नाम से ही जाना जाता है, अर्थात ‘वन मैन शो पार्टी’। यहां तक तो ठीक था लेकिन राजनीति की अधूरी शिक्षा ज्यादा दिनों तक मायावती का साथ नहीं दे पायी। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि कच्ची शिक्षा के दौरान यदि गुरू का साथ छूट जाए तो चेले की शिक्षा ‘अधजल गगरी छलकत जाए’ जैसी हो जाती है। कुछ ऐसा ही हुआ बसपा प्रमुख मायावती के साथ।

    मायावती के राजनीतिक गुरु कांशीराम का साथ छूटा तो राजनीति की अधूरी शिक्षा ने ‘नया मुसलमान प्याज ज्यादा खाता है’ की तर्ज पर उबाल तो मारा लेकिन मायावती की अगुवाई में बसपा की राजनीतिक दिशा अपनी समरसता को ज्यादा समय तक कायम नहीं रख सकी। एक समय ऐसा भी आया था जब पूरे उत्तर प्रदेश का दलित समाज बसपा प्रमुख कांशीराम और मायावती को ही अपना रहनुमा मान बैठा था। असर भी देखने को मिला। वर्ष 1989, यह वह दिन थे जिन दिनों उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में बदलाव की लहर उफान पर थी।

    विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनता पार्टी का प्रभाव पूरे देश में युवाओं के सिर चढ़कर बोल रहा था। उस वक्त वीपी सिंह को वामपंथों के साथ ही दक्षिणपंथियों का खुला समर्थन मिल रहा था तो वहीं दूसरी ओर बसपा संस्थापक कांशीराम दलितों और मुसलमानों के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिक जमीन पर पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे। रही बात मायावती की तो उन्हें बसपा संस्थापक कांशीराम का दायां हाथ समझा जाता था। अर्थात कंधे से कंधा मिलाकर राजनीतिक जमीन पर पांव जमाने की कोशिश। इस कोशिश में उन्हें सफलता भी मिली। उन्हीं दिनों ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार का नारा दलित समुदाय के बीच बुलन्द हुआ।

    बसपा खुलकर दलित और मुसलमानों की राजनीति पर उतर आयी। हालांकि मुसलमानों की तरफ फेंका गया चारा तो काम नहीं आया अलबत्ता दलितों का रुझान अवश्य बसपा में देखने को मिला। यही वह साल था जब बसपा को पहली बार तीन सीटों पर विजय हासिल हुई। मायावती स्वयं बिजनौर सीट पर विजयी हुईं।


    बगावत पर क्यों विवश हैं नेता :

    बसपा प्रमुख मायावती ने दलितों की राजनीति से सर्वजन समाज की राजनीति में कदम क्या रखा पार्टी के विश्वसनीय कार्यकर्ता एक-एक करके बाहर होते जा रहे हैं। हाल ही में मायावती ने पार्टी के सबसे पुराने और विश्वसनीय नेताओं में शुमार राम अचल राजभर और लालजी वर्मा को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इससे पूर्व हरदोई (मल्लावां) से विधायक बृजेश कुमार के साथ ही लखीमपुर खीरी से विधायक रोमी साहनी को बाहर का रास्ता दिखाया गया। इनके अतिरिक्त राजेश बालमीकि, गुड्डू त्रिपाठी को भी अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। बसपा के ये नेता तो महज बानगी मात्र हैं जबकि कई अन्य विधायक भी पार्टी में फूट डालने के आरोप में बाहर किए जा चुके हैं। प्रश्न यह उठता है कि आखिरकार वह कौन सी वजह है जिसने बसपा के कर्मठ नेताओं को बगावत करने पर विवश कर दिया।


    तिलक, तराजू वाले नारे ने बसपा को पहचान तो जरूर दी लेकिन सूबे की सत्ता पर बैठने लायक सीटें नहीं दीं। मायावती के एकाधिकारी वाली बसपा ने सूबे की सत्ता का स्वाद चखने के लिए कई प्रयोग भी कर डाले। मसलन कभी भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनायी हो या फिर सपा के साथ मिलकर। दोनों ही प्रयोग बसपा के लिए आत्मघाती सिद्ध हुए। स्टेट गेस्ट हाउस कांड जैसा राजनीति का घिनौना दृश्य भी सूबे की जनता को देखने को मिला।

    मायावती को लगा कि सिर्फ दलितों की राजनीति करके स्वतंत्र रूप से सत्ता का स्वाद नहीं लिया जा सकता। परिणामस्वरूप बसपा नेताओं के तमाम विरोध के बावजूद मायावती ने तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ की अवधारणा से बाहर निकलकर सर्वजन हिताए सर्वजन सुखाए की रणनीति तैयार की। सतीश मिश्रा और नकुल दुबे सरीखे नेताओं के साथ ही बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को पार्टी में शामिल किया गया। इसके बाद नारा बुलन्द हुआ ‘ये हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश’ हैं। इस नारे का असर वर्ष 2007 में देखने को मिला जब पूर्ण बहुमत के साथ बसपा ने सरकार बनायी। इस प्रयोग की सफलता ने बसपा प्रमुख मायावती को पार्टी की उस रणनीति को बदलने पर मजबूर कर दिया जिसकी पटकथा बसपा संस्थापक कांशीराम ने लिखी थी। इसके बाद तो बसपा में सर्वजन हिताए, सर्वजन सुखाए का ही चहुंओर बोलबाला हो गया। एक समय तो ऐसा भी आया जब बसपा से नाराज दलितों ने यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि बसपा अब बहुजन समाज पार्टी नहीं बल्कि ब्राह्मण समाज पार्टी बन चुकी है।

    सतीश मिश्रा के कद को मायावती के बराबर मानकर देखा जाने लगा था। इतना ही नहीं नकुल दुबे के साथ ही बसपा के अन्य ब्राह्मण विधायक एवं कार्यकर्ता भी बसपा में पूजे जाने लगे थे। इन सबके बीच खास बात यह रही कि मायावती ने ब्राह्मणों को पार्टी में स्थान तो दिया, टिकट देकर विधानसभा भी पहुंचाया लेकिन बात यदि मंत्रिमण्डल में उच्च पद दिए जाने की हो तो ब्राह्मण को पूरी तरह से नजरअन्दाज किया जाता रहा। वर्ष 2007 से वर्ष 2012 तक, जब तक यूपी में बसपा की सरकार रही ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने में सतीश मिश्रा को पसीने छूट गए। दूसरी ओर दलित वर्ग भी लगातार बसपा से दूरी बनाने लगा था। वर्ष 2007 में मिली अपार सफलता ने मायावती को इतना उत्साहित कर दिया कि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा ने इसी फार्मूले पर चुनाव लड़ा। परिणाम सामने आए तो बसपा को इस बात का अहसास हो गया कि दलितों को नजरअन्दाज नहीं किया जाना चाहिए था।

    बताते चलें कि वर्ष 2007 में बसपा ने 30.43 प्रतिशत वोट के साथ 206 सीटों पर कब्जा किया था। उस वक्त एक और नारा बुलन्द हुआ था, ‘चढ़ गुण्डन की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर।’ वर्ष 2012 के चुनाव में भी बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग की तर्ज पर चुनाव लड़ा। ब्राह्मणों के साथ ही अन्य सवर्ण जातियों को बड़ी संख्या में टिकट दिया। बसपा प्रमुख मायावती को उम्मीद थी कि सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला रंग लायेगा और बसपा का परचम दोबारा सूबे की सत्ता पर लहरायेगा। रिजल्ट आया तो मायावती का चैंकना स्वाभाविक था। जिस बसपा को वर्ष 2007 में 206 सीटें प्राप्त हुईं थीं वह मात्र 80 सीटों पर ही सिमट गयी।

    स्पष्ट हो चला था कि दलितों की नाराजगी ने बसपा को सबक सिखाया है। इसके बाद बसपा ने दोबारा दलितों की ओर रुख किया। पार्टी के सवर्ण नेताओं को हाशिए पर ला खड़ा किया और दलितों को दोबारा तवज्जो दिए जाने की बात कही जाने लगी। जब विधानसभा चुनाव 2017 के लिए टिकट बंटा तो एक बार फिर से दलित और पिछड़ी जातियों को नजरअन्दाज किया गया। नतीजा ये हुआ कि वर्ष 2012 में 80 सीटों पर सिमटने वाली बसपा को सिर्फ 19 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।

    वर्ष 2017 से वर्ष 2021 के बीच लगभग चार वर्षों के दौरान बसपा प्रमुख मायावती लगभग अज्ञातवास में रहीं। न तो वे मीडिया में कहीं दिखीं और न ही किसी प्रकार की जनसभा में। पार्टी नेताओं के मुंह पर ताले पहले से ही जड़े हुए थे लिहाजा बसपा की गतिविधियां कहीं नजर नहीं आयीं। अब जबकि अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं और सभी दल अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगे हैं लिहाजा मायावती भी अपना अज्ञातवास छोड़कर मैदान में नजर आने लगी हैं।

    मायावती के मैदान में उतरते ही चर्चाओं ने भी जो पकड़ा है। चर्चा इस बात की हो रही है कि आखिरकार इस बार मायावती कौन सी रणनीति अपनायेंगी। नया-नवेला ‘सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला’ या फिर पुराना दलित राग। हालांकि बसपा नेताओं से चुनावी रणनीति का सच उगलवाना टेढ़ी खीर है लेकिन कुछ नेता अभी भी हैं जो अन्दरखाने की जानकारियां मीडिया तक पहुंचाते रहते हैं।

    बसपा के अन्दरखाने से मिली जानकारी तो कह रही है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में बसपा नए कलेवर, नए तेवर के साथ मैदान में नजर आयेगी। फार्मूला वही ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का रहेगा लेकिन इस बार टिकट बंटवारे के दौरान दलितों और मुसलमानों का विशेष ध्यान रखा जायेगा। नारा वही ‘सर्वजन हिताए, सर्वजन सुखाए’। बूथ स्तर तक बसपा के इस फार्मूले को पहुंचाने की कोशिशें शुरु की जा चुकी हैं। सतीश मिश्रा एक बार फिर से प्रमुख भूमिका निभायेंगे लेकिन मायावती के आदेश पर।

    फिलहाल दलितों की ब्रांडेड पार्टी इस बार के विधानसभा चुनाव में कहां नजर आयेगी? इसका फैसला तो चुनाव परिणाम के बाद ही होगा लेकिन इस बार का चुनाव दिलचस्प होगा, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए, क्योंकि जहां एक ओर यूपी में भाजपा के खिलाफ लहर चल रही है वहीं दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ को लेकर पार्टी में बगावत की स्थिति अपने पूरे शवाब पर है।

    हाल ही में पार्टी के बड़े नेताओं के दौरों ने इसकी पुष्टि भी कर दी है। इसके बाद एकाएक योगी आदित्यनाथ का दिल्ली जाना और पार्टी हाई कमान से मुलाकात के पश्चात भी छाया सन्नाटा इस बात की तस्दीक कर रहा है कि यूपी में भाजपा की स्थिति ठीक नहीं। ऐसे में यूपी में सपा और बसपा ही ऐसी पार्टियां हैं जो 2022 के चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकती हैं। भले ही वर्ष 2012 के बाद से बसपा में डाउनफाल नजर आया हो लेकिन यूपी की राजनीति में दलितों की बात करने वाली बसपा को कमजोर आंकना विरोधी दलों को भारी पड़ सकता है। यदि बसपा की सोशल इंजीनियरिंग योजनाबद्ध तरीके से प्रयोग में लायी गयी तो निश्चित तौर पर भाजपा ही नहीं सपा को भी झटका मिल सकता है।


    ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का फार्मूला एक बार फिर होगा इस्तेमाल :

    बसपा सुप्रीमो मायावती मिशन-2022 की तैयारियों में जुट गई हैं। बसपा संगठन में जातीय समीकरण का संतुलन बनाया जा रहा है। इसमें खासकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ब्राह्मण, मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग का ऐसा समीकरण तैयार किया जा रहा है जो चुनावी समर में सिर चढ़कर बोले। जातीय समीकरण के आधार पर ही संगठन में ओहदे तय किए जा रहे हैं।
    क्षेत्रीय जाति के आधार पर मुख्य सेक्टर प्रभारी, सेक्टर प्रभारी और जिला सेक्टर प्रभारी बनाए जाने का काम जोर-शोर से चल रहा है। पूरे उत्तर प्रदेश को 18 सेक्टरों में बांटा गया है। रणनीति के तहत हर सेक्टर में भरोसेमंदों पर भरोसा जताया गया है। यही वजह है कि जिन पर भी जरा भी शक हो रहा है उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।

    बूथ स्तर पर भी लोगों को बसपा से जोड़ने का काम चल रहा है। इस बार खासतौर से संगठन विस्तार में युवाओं को अधिक तरजीह दी जा रही है। खासकर बूथ कमेटियों में युवाओं को अधिक से अधिक संख्या में जोड़ा जा रहा है।

    विधानसभा चुनाव के लिए टिकट देने से पहले उम्मीदवारों का पैनल तैयार किया जायेगा। इस काम में कोआर्डिनेटरों की मुख्य भूमिका अहम होगी। प्रत्येक विधानसभा से टाॅप-10 का पैनल बनाया जाएगा। इसमें जातीय समीकरण के आधार पर फिट बैठने वालों को ही मैदान में उतारा जायेगा। खास बात यह है कि इस बार पूरी कमान मायावती ने स्वयं संभाल रखी है।

    • लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं 

    Shagun

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