अंशुमाली रस्तोगी
‘हंस’ पत्रिका के पुराने अंक निकाल लिए हैं। वो भी, राजेंद्र यादव के संपादकीय पढ़ने के लिए। ‘हंस’ में राजेंद्र यादव के संपादकीय के अतिरिक्त, न तब न अब, कुछ खास रहा ही नहीं पढ़ने को। जिस अदा और बेबाकी से राजेंद्र जी अपनी बात कहते थे, हिंदी में ऐसे संपादक कम ही हुए हैं। उनका हर संपादकीय ‘तहलका’ से कम न होता था।
और, कितना पढ़ते (देशी-विदेशी) थे वह। जाने कितनी ही किताबों और लेखकों का हवाला दे देते थे। मगर जब कहने पर आते थे, तब ‘रहम’ किसी पर नहीं करते थे। एक दफा राजेंद्र जी को करीना कपूर के चेहरे पर ‘नमक’ नजर आया था। तब अच्छी-खासी बहस-सी छिड़ गई थी। अपने खिलाफ असहमति और बहस को ‘हंस’ पन्नों पर छापने की हिम्मत वह ही रखते थे। वरना तो संपादक खुद की वाह-वाह और प्रशंसा से बाहर निकल ही नहीं पाते।
अभी ‘हंस’ कैसा निकल रहा है। उसमें क्या छप रहा है। संपादकीय में जोश रहता भी है कि नहीं; कुछ नहीं पता। क्योंकि राजेंद्र जी के बाद मैंने ‘हंस’ पढ़ना और खरीदना लगभग बंद ही कर दिया। ‘हंस’ की प्रगतिशीलता राजेंद्र जी के साथ ही चली गई।







