लगता, घट, रीत गया
कैसे, समय बीत गया
मन ,शान्त रहा बैठा
लिखा न, कोई गीत नया
चल मन, कर हल चल
बीतता,जाता है पल
है चिड़ियों का शोर वही
है, किसी का जोर नहीं
मन, छन्द, दोहे रचता नहीं
मिला न कोई मीत नया
चल मन, कर हल चल
बीतता जाता है पल
बून्दें हैं, सागर भर रही
सरिता भी, पूर्ववत, बह रही
मन मे, न आता उफान क्यों
बजता, न कोई ,संगीत नया
चल मन, कर हल चल
बीतता जाता है पल
दिन उगते हैं, रात ढलतीं
रीति न, है ऋतु भी, बदलती
हृदय में, धड़कन वही फिर
ब्रज,क्यों न, लिखता गीत नया
चल मन, कर हल चल
बीतता जाता है पल
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र







