बूंदे बरसने दो, फुहार होने दो
अंकुर, पनपते दो, श्रृंगार होने दो
धरा की प्यास है, बूंदों की
इसका अब प्यार, होने दो
जुल्फों में आ लटकी हैं, बादल से
सजनी ,इन बूंदों का,प्रहार होने दो
छलक लेने दो, मौसमें बरसात में
आंखों को ,क्यों अंगार होने दो
कभी खुशबू बनो, सोंधी माटी की
सजनी,ब्रज को,शिकार होने दो
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र







