गीत; अरविंद कुमार ‘साहू’
साथिया होना नही निराश,
समय हो जायेगा अनुकूल।
अभी तो उफनी है नदिया ,
फूलते तटबंधों के श्वास,
कगारों का करुणित क्रन्दन,
तोड़ता बन्धन के विश्वास,
किन्तु ये दुर्दिन अस्थायी,
सभी आशंका है निर्मूल।
साथिया, होना नही निराश,,,,।।
होंगी इच्छायें फिर पूरी,
जिसे लेकर तुमको है चाव,
जल्द ही आयेगी इस घाट,
तुम्हारी वह सपनों की नाव,
पुरानी कड़वी यादों को,
जल्द ही तुम जाओगे भूल,
साथिया होना नहीं निराश,,,,,,।।
ठहर जायेगा उद्वेलन,
आँसुओं में होगा ठहराव,
शान्त हो जायेगा यह ज्वार,
भरेगा फिर से मन का घाव,
हरा होगा बासन्तिक पर्व
विचारों में विहँसेगे फूल।
साथिया, होना नही निराश,,,,।।







